Bihar News : बिहार के शिक्षा विभाग का एक ऐसा कारनामा सामने आया है, जिसे देखकर कोई भी कह उठेगा—‘ये तो हद हो गई!’ जिन शिक्षकों की सांसें थम चुकी हैं और जो इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं, विभाग के रिकॉर्ड में उनकी ड्यूटी शायद अब भी बाकी है। मामला ट्रेनिंग में शामिल होने का है, लेकिन कहानी में ट्विस्ट ऐसा है कि बॉलीवुड के किसी कॉमेडी डायरेक्टर को भी पटकथा लिखने का नया आइडिया मिल जाए। दो दिवंगत शिक्षकों को प्रशिक्षण में शामिल नहीं होने पर नोटिस थमा दिया गया और उनसे पूछा गया कि आखिर वे ट्रेनिंग में क्यों नहीं पहुंचे?
अब सवाल यह है कि जब शिक्षक इस दुनिया में ही नहीं हैं, तो वे प्रशिक्षण केंद्र तक पहुंचें कैसे? क्या विभाग को उम्मीद थी कि दोनों शिक्षक स्वर्ग से छुट्टी लेकर हाजिरी लगाने आ जाएंगे? या फिर सरकारी फाइलों में मौत की खबर पहुंचने से पहले ही अनुपस्थिति का हिसाब-किताब तैयार हो गया? मामला भले ही प्रशासनिक चूक का हो, लेकिन इसने सरकारी व्यवस्था के कामकाज पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आमतौर पर किसी शिक्षक के प्रशिक्षण में शामिल नहीं होने पर विभाग कारण पूछता है। यह व्यवस्था इसलिए है ताकि प्रशिक्षण का काम समय पर पूरा हो और शिक्षक नई शैक्षणिक व्यवस्था से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकें। लेकिन जब यही प्रक्रिया बिना यह जांचे आगे बढ़ जाए कि संबंधित शिक्षक जीवित भी हैं या नहीं, तो सवाल उठना लाजिमी है। आखिर नोटिस जारी करने से पहले संबंधित शिक्षकों की सेवा स्थिति की जांच क्यों नहीं की गई?
फिल्मी अंदाज में देखें तो यह किसी ऐसी कॉमेडी फिल्म का दृश्य लगता है, जिसमें हीरो पर्दे पर मौजूद नहीं होता, लेकिन उसकी तलाश में पूरी कहानी आगे बढ़ती रहती है। यहां फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म में दर्शक हंसते हैं, जबकि सरकारी व्यवस्था की ऐसी चूक सामने आने पर आम लोगों को हैरानी होती है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजन को खोया, उनके लिए यह मामला मजाक का विषय नहीं, बल्कि संवेदनहीन प्रशासनिक प्रक्रिया का उदाहरण बन सकता है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल विभागीय रिकॉर्ड और आपसी समन्वय को लेकर है। शिक्षक की मृत्यु के बाद संबंधित कार्यालयों के रिकॉर्ड में उसका अपडेट होना जरूरी है। यदि मृत्यु की सूचना समय पर दर्ज नहीं हुई या अलग-अलग विभागों के रिकॉर्ड में जानकारी अपडेट नहीं की गई, तो ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि, इस मामले में वास्तविक चूक कहां हुई, यह संबंधित विभाग की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं। किसी कर्मचारी की अनुपस्थिति पर कार्रवाई करने से पहले उसकी स्थिति की पुष्टि करना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। खासकर तब, जब मामला सरकारी कर्मचारियों के सेवा रिकॉर्ड से जुड़ा हो। केवल सूची में नाम दर्ज होने के आधार पर नोटिस जारी कर देना और वास्तविक स्थिति की जांच नहीं करना व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस गलती को किस तरह सुधारता है। क्या संबंधित रिकॉर्ड की जांच होगी? क्या नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में हुई चूक की जिम्मेदारी तय की जाएगी? और क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस व्यवस्था बनेगी?
फिलहाल इस घटना ने सरकारी सिस्टम की उस तस्वीर को सामने ला दिया है, जहां कागजों पर चल रही प्रक्रिया और जमीन की हकीकत के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। शिक्षक दुनिया से विदा हो गए, लेकिन विभागीय कागजों में उनकी हाजिरी का हिसाब बाकी रह गया। तंज अपनी जगह है, मगर असली सवाल यही है—अगर सरकारी रिकॉर्ड में दिवंगत कर्मचारियों की जानकारी तक दुरुस्त नहीं है, तो व्यवस्था की निगरानी आखिर कौन कर रहा है?