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02-Apr-2026 05:35 PM
By First Bihar
The New Rule of Inheritance: उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में एक बड़ा और अहम फैसला सुनाते हुए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने विरासत के नियमों को लेकर स्थिति बिल्कुल साफ कर दी है। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि अगर किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत और बिना संतान के मृत्यु हो जाती है, तो उसकी संपत्ति किसे मिलेगी और किसे नहीं।
कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि अगर किसी महिला को संपत्ति उसके माता-पिता से मिली है, तो उसकी मृत्यु के बाद उस संपत्ति पर पति या ससुराल पक्ष का कोई अधिकार नहीं होगा। ऐसी स्थिति में वह संपत्ति महिला के पिता के वारिसों को ही सौंपी जाएगी।
मामले की शुरुआत कैसे हुई
यह मामला ‘चिक्काला देविका बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ से जुड़ा हुआ है, जिसमें संपत्ति को लेकर परिवार के भीतर विवाद खड़ा हो गया था। जानकारी के अनुसार, एक दादी ने अपनी पोती को गिफ्ट डीड के जरिए संपत्ति दी थी।
लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलीं और उस पोती की बिना संतान और बिना वसीयत मृत्यु हो गई। इसके बाद दादी ने पहले की गई गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया और उसी संपत्ति को अपनी दूसरी पोती के नाम वसीयत कर दिया।
यहीं से विवाद शुरू हुआ और मामला अदालत तक पहुंच गया, जहां इस पर विस्तृत सुनवाई की गई।
कानून की कौन-सी धारा बनी आधार
इस पूरे मामले में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(2)(a) का सहारा लिया।
कोर्ट ने कहा कि यह धारा सामान्य नियमों से अलग और अधिक महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट करती है कि अगर किसी महिला को संपत्ति उसके माता-पिता से मिली है, तो उसकी मृत्यु के बाद वह संपत्ति उसी परिवार में वापस जानी चाहिए, जहां से वह आई थी।
फैसले की अहम बात
कोर्ट ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि सिर्फ पति होने के आधार पर किसी व्यक्ति को पत्नी की संपत्ति पर अधिकार नहीं मिल सकता। अधिकार इस बात पर निर्भर करेगा कि संपत्ति का स्रोत क्या है।
अगर संपत्ति मायके यानी माता-पिता की ओर से मिली है, तो संतान न होने की स्थिति में वह पति को नहीं, बल्कि महिला के पिता के परिवार को जाएगी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह निर्णय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में आने वाले ऐसे कई मामलों के लिए मार्गदर्शक साबित होगा। अक्सर ऐसे विवाद सामने आते हैं, जहां महिला की मृत्यु के बाद संपत्ति को लेकर मायके और ससुराल पक्ष के बीच टकराव हो जाता है।
अब इस फैसले के बाद स्थिति काफी हद तक साफ हो गई है और कानून की व्याख्या भी स्पष्ट हो गई है।
प्रशासन को भी मिलेगी मदद
यह निर्णय सिर्फ परिवारों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रशासन और राजस्व विभाग के लिए भी अहम है। खासकर नामांतरण (म्यूटेशन) जैसे मामलों में, जहां अक्सर भ्रम की स्थिति बनती है, वहां अब स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलेंगे।
इससे अनावश्यक विवाद कम होंगे और फैसले जल्दी लिए जा सकेंगे।
रिश्तों से ज्यादा कानून की अहमियत
इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि संपत्ति का बंटवारा भावनाओं या रिश्तों के आधार पर नहीं, बल्कि कानून के अनुसार होता है। शादी का रिश्ता अपने आप संपत्ति पर अधिकार नहीं देता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पैतृक संपत्ति को उसी वंश में बनाए रखना कानून का उद्देश्य है, ताकि वह बिना कारण दूसरे परिवार में स्थानांतरित न हो।