नई दिल्ली/रुड़की: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को देश दुनिया में उनकी रणनीतिक समझ और खुफिया अभियानों के लिए जाना जाता है। लेकिन उनके करियर के शुरुआती दिनों की एक ऐसी कहानी है, जिसमें डर, चिंता, असफलता का एहसास और फिर उससे निकलने की प्रेरणा—सब कुछ शामिल है। अजीत डोभाल ने यह दिलचस्प और भावुक किस्सा IIT रुड़की के दीक्षांत समारोह में छात्रों के साथ साझा किया।
डोभाल ने बताया कि जब वह 20 की उम्र में एक युवा IPS अधिकारी थे, तब उन्हें सिक्किम में इंटेलिजेंस की जिम्मेदारी दी गई थी। यह उनके करियर का शुरुआती दौर था और उनकी जिम्मेदारियों में सीमावर्ती इलाकों पर नजर रखना तथा चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की गतिविधियों के बारे में खुफिया जानकारी जुटाना भी शामिल था।
बॉर्डर पर भेजी गई टीम, लेकिन 8 दिन बाद भी नहीं लौटी
डोभाल के मुताबिक, एक बार बॉर्डर इलाके में एक इंटेलिजेंस मिशन के लिए टीम भेजी गई। योजना के अनुसार टीम को करीब आठ दिन में वापस लौटना था। लेकिन आठ दिन बीत गए और टीम नहीं लौटी। इसके बाद दिन गुजरते चले गए। पहले पांच दिन, फिर दस दिन और देखते ही देखते करीब 15 दिन बीत गए। डोभाल के लिए यह स्थिति बेहद तनावपूर्ण होती जा रही थी। उन्हें यह तक पता नहीं था कि मिशन पर गए लोग सुरक्षित हैं या नहीं।
सबसे बड़ी चिंता यह थी कि यदि टीम के साथ कोई दुर्घटना हुई है तो उसका पता कैसे चलेगा। किसी हिमस्खलन या प्राकृतिक आपदा की भी कोई सूचना नहीं थी। ऐसे में एक युवा अधिकारी के तौर पर डोभाल पर मानसिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था।
अचानक आया मुख्यालय से फोन और खुला बड़ा राज
इसी बीच डोभाल को मुख्यालय से फोन आया। उनके वरिष्ठ अधिकारी ने पूछा कि क्या उन्होंने कुछ लोगों को सीमा के उस पार भेजा है। डोभाल ने जवाब दिया कि उन्हें इसकी जानकारी है कि टीम गई थी और उसे कुछ दिनों में लौटना था, लेकिन अब काफी समय बीत चुका है।तभी उन्हें पता चला कि मिशन पर गए लोग चीनी हिरासत में हैं।
चीनी सैनिकों ने टीम को पकड़ लिया था और उनसे पूछताछ की गई थी। डोभाल के मुताबिक, बाद में बातचीत और एक समझौते के जरिए उन लोगों को वापस लाया गया। लेकिन जब वे लौटे तो उनकी हालत बेहद खराब थी। वे पूरी तरह टूट चुके थे और बुरी स्थिति में वापस आए थे। यह घटना डोभाल के लिए सिर्फ एक ऑपरेशन की समस्या नहीं थी। इसका सीधा असर उनके करियर पर पड़ने की आशंका भी थी।
डोभाल को लगा- अब करियर खत्म हो गया
डोभाल ने छात्रों को बताया कि इस घटना के बाद जांच शुरू हुई। उस समय उन्हें लगा कि उनका करियर अब खत्म हो गया है। वह अभी 20 की उम्र में थे और उन्हें लगने लगा था कि शायद उन्हें अब अपना करियर किसी दूसरी दिशा में शुरू करना पड़ेगा।उन्हें लग रहा था कि मिशन में बड़ी चूक हुई है और इसकी जिम्मेदारी उनके सिर आ सकती है। लेकिन जांच के बाद तस्वीर कुछ और निकली।जांच में डोभाल को किसी गलती का दोषी नहीं पाया गया। बाद में सामने आया कि मुख्यालय की ओर से उपलब्ध कराए गए स्केच और नक्शों में कुछ गलतियां थीं। इन्हीं गलतियों ने पूरे घटनाक्रम को जन्म दिया था।फिर भी इस घटना ने युवा डोभाल को भीतर तक प्रभावित किया।
जब एक बुजुर्ग शेरपा ने पूछा- इतने दुखी क्यों हैं?
डोभाल ने बताया कि घटना के बाद वह काफी परेशान रहने लगे थे। इसी दौरान उनके साथ काम करने वाले एक बुजुर्ग तिब्बती शेरपा ने उनकी परेशानी को भांप लिया।उसने डोभाल से पूछा कि वह इतने दुखी क्यों हैं।डोभाल ने उसे बताया कि उन्होंने बहुत सारी उम्मीदों और आकांक्षाओं के साथ अपना करियर शुरू किया था, लेकिन अब उन्हें लग रहा है कि सब कुछ गलत हो गया है।शेरपा ने उनकी बात सुनी और फिर उन्हें जिंदगी का ऐसा सबक दिया, जिसे डोभाल आज भी याद करते हैं।
शेरपा की तीन बातें, जिन्हें डोभाल आज तक नहीं भूले
बर्फीले पहाड़ों में वर्षों तक काम कर चुके उस शेरपा ने डोभाल को नक्शा पढ़ने का उदाहरण देते हुए कहा कि जिंदगी में सबसे जरूरी है यह समझना कि आप इस समय कहां हैं और आपको जाना कहां है।उसने डोभाल को जिंदगी के तीन नियम बताए—पहला- आपको पता होना चाहिए कि आप इस समय कहां हैं।दूसरा- आपको पता होना चाहिए कि आपको जाना कहां है।तीसरा- आपको यह पता होना चाहिए कि वहां तक पहुंचने का रास्ता क्या है।
डोभाल के मुताबिक, शेरपा की ये बातें उनके जीवन में गहराई से उतर गईं। एक ऐसा वक्त जब उन्हें लग रहा था कि सब कुछ खत्म हो गया है, उसी वक्त उन्हें यह समझ मिली कि रास्ते में आने वाली एक गलती या परेशानी पूरी जिंदगी का अंत नहीं होती।
छात्रों को डोभाल की बड़ी सीख- मुश्किल वक्त में रास्ता तलाशिए
IIT रुड़की के दीक्षांत समारोह में डोभाल ने इस पुराने अनुभव को छात्रों के सामने इसलिए रखा, ताकि वे समझ सकें कि करियर और जिंदगी में मुश्किल दौर आना स्वाभाविक है। कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि व्यक्ति को लगता है कि उसका रास्ता बंद हो चुका है। लेकिन ऐसे समय में घबराने के बजाय तीन सवाल खुद से पूछने चाहिए—मैं अभी कहां हूं? मुझे कहां पहुंचना है? और वहां तक पहुंचने का रास्ता क्या है?
डोभाल ने छात्रों से यह भी कहा कि आज की पीढ़ी के सामने अवसरों की कमी नहीं है। उनके मुताबिक, पिछली कई पीढ़ियों को जिन अवसरों का इंतजार करना पड़ा, आज की पीढ़ी के सामने तकनीक और वैश्विक बदलावों के कारण नई संभावनाएं खुल रही हैं।उन्होंने कहा कि आने वाले समय में किसी भी देश और समाज की वृद्धि और प्रगति में तकनीक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी।
यानी, डोभाल की कहानी सिर्फ चीन की हिरासत में गए एक खुफिया मिशन की कहानी नहीं है। यह उस युवा अधिकारी की कहानी भी है, जिसने अपने करियर के सबसे कठिन दौर में यह सीखा कि कभी-कभी मंजिल से ज्यादा जरूरी यह समझना होता है कि आप इस वक्त किस जगह खड़े हैं और वहां से आगे जाने का सही रास्ता कौन-सा है।