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29-Oct-2025 09:07 AM
By First Bihar
Bihar voter list : बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (एसआईआर) के बाद एक अहम बदलाव सामने आया है। राज्य में पुरुषों के मुकाबले महिला मतदाताओं का अनुपात घट गया है। चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2025 में प्रति हजार पुरुषों पर 914 महिला मतदाता थीं, जो अब घटकर 892 रह गई हैं। यानी सात माह में बिहार में हर हजार पुरुषों पर 22 महिलाओं की कमी दर्ज की गई है।
एसआईआर अभियान के दौरान राज्यभर में 22.74 लाख महिलाओं और 15.55 लाख पुरुषों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। अधिकारियों का कहना है कि इनमें से अधिकतर नाम दोहराव, मृत्यु या स्थानांतरण जैसे कारणों से काटे गए। हालांकि इस प्रक्रिया का असर महिलाओं के मतदाता अनुपात पर अधिक पड़ा है। भोजपुर जिले को छोड़कर बिहार के सभी 37 जिलों में महिला मतदाताओं का लिंगानुपात घटा है।
जिलों में सबसे बड़ा अंतर किशनगंज में
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, किशनगंज जिले में महिलाओं का लिंगानुपात सबसे तेजी से गिरा है। जनवरी 2025 में यहां प्रति 1000 पुरुषों पर 937 महिलाएं थीं, जो अब घटकर 874 रह गई हैं — यानी सात महीने में 63 अंकों की गिरावट। इसी तरह भागलपुर में 43, पूर्णिया में 38, बक्सर में 36 और सीवान में 34 अंकों की कमी आई है।
भागलपुर जिले में फिलहाल सबसे अधिक प्रति हजार पुरुषों पर 939 महिला मतदाता हैं, जबकि लखीसराय और पश्चिमी चंपारण में यह आंकड़ा सबसे कम 872 है। कुल 12 जिलों का औसत राज्य के औसत 892 से भी नीचे चला गया है। इनमें सीतामढ़ी, मुंगेर, समस्तीपुर, पूर्वी चंपारण, किशनगंज, शिवहर, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, बेगूसराय, भोजपुर, रोहतास, जहानाबाद और औरंगाबाद शामिल हैं।
कुछ जिलों ने बनाए रखी संतुलन की स्थिति
एसआईआर के बाद 11 जिलों में महिला मतदाताओं का लिंगानुपात 900 से अधिक रहा है। इनमें गया, नवादा, जमुई, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा, शेखपुरा, सुपौल, अररिया और भागलपुर शामिल हैं। वहीं, जनवरी 2025 में प्रकाशित सूची के अनुसार, तब 18 जिलों में महिलाओं का लिंगानुपात 2011 की जनगणना के मुकाबले बेहतर था। लेकिन अब यह संख्या घटकर सिर्फ पांच जिलों तक सीमित रह गई है — मधेपुरा, सहरसा, वैशाली, खगड़िया और भागलपुर। 2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार का औसत लिंगानुपात प्रति हजार पुरुषों पर 918 महिलाओं का था। एसआईआर के बाद अब राज्य का मतदाता लिंगानुपात इस औसत से काफी नीचे चला गया है।
मतदाता संख्या में आई भारी कमी
विशेष पुनरीक्षण अभियान के बाद राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या भी घटी है। जनवरी 2025 में जहां 7.89 करोड़ मतदाता दर्ज थे, वहीं 30 सितंबर को प्रकाशित नई सूची के अनुसार अब 7.42 करोड़ मतदाता हैं। यानी लगभग 47 लाख नाम हटाए गए। इसमें महिलाओं का हिस्सा पुरुषों की तुलना में अधिक रहा है, जिससे राजनीतिक दलों के लिए यह चिंता का विषय बन गया है।
राजनीतिक दलों की रणनीति: महिला वोटरों पर फोकस
बिहार की राजनीति में महिला मतदाताओं की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। पिछली कई चुनावों में महिलाओं की मतदान दर पुरुषों से अधिक रही थी। यही कारण है कि इस बार भी एनडीए और महागठबंधन दोनों ही गठबंधन महिला वोटरों को साधने में जुटे हैं। एनडीए सरकार ने हाल ही में सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि बढ़ाकर 1100 रुपये प्रतिमाह कर दी है। साथ ही, जीविका दीदियों और आंगनबाड़ी सेविकाओं के मानदेय में वृद्धि की गई है। सरकार का दावा है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए स्वरोजगार योजनाओं और स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
वहीं, महागठबंधन ने अपने चुनावी वादों में महिलाओं को विशेष आर्थिक सहायता देने का वादा किया है। राजद-कांग्रेस गठबंधन ने घोषणा की है कि अगर उनकी सरकार बनती है तो एक दिसंबर से सभी महिलाओं को प्रतिमाह 2500 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। इसके अलावा, महिला शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी कई योजनाएं भी प्रस्तावित हैं।
महिला मतदाताओं पर टिकी नजरें
बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या घटने के बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव कम नहीं हुआ है। राज्य में करीब 3.5 करोड़ महिला मतदाता हैं, जो किसी भी दल की जीत या हार तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यही वजह है कि सभी दल अब “महिला सशक्तिकरण” को अपने घोषणापत्र और प्रचार का केंद्र बना रहे हैं।
एसआईआर के आंकड़े भले ही मतदाता सूची में असंतुलन की तस्वीर दिखा रहे हों, लेकिन चुनावी राजनीति में महिलाओं का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में महिला मतदाता ही एक बार फिर सियासत की दिशा और दशा तय कर सकती हैं।