Samrat Chaudhari: बिहार की सियासत में आज से एक नए दौर की शुरुआत हो रही है। सम्राट चौधरी राज्य के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं। कभी राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे सम्राट चौधरी अब उसी बिहार की कमान संभालने जा रहे हैं, जिसकी राजनीति को उन्होंने करीब से देखा और समझा है। यह मुकाम न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष की जीत है, बल्कि उनके परिवार की राजनीतिक विरासत का भी शिखर है। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार के दिग्गज समाजवादी नेताओं में गिने जाते रहे हैं।


विरासत और शुरुआती राजनीतिक सफर

16 नवंबर 1968 को मुंगेर के लखनपुर में जन्मे सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर काफी दिलचस्प रहा है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से की। महज 19 साल की उम्र में वे राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बने, हालांकि उम्र विवाद के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा। लेकिन इस घटना ने उन्हें शुरुआती दौर में ही सुर्खियों में ला दिया। अपने पिता शकुनी चौधरी के मार्गदर्शन में उन्होंने राजनीति की बारीकियों को समझा। समय के साथ उन्होंने राजद से जेडीयू और फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तक का सफर तय किया, जो उनके राजनीतिक लचीलेपन और रणनीतिक समझ को दर्शाता है।


भाजपा में तेजी से उभार

भाजपा में शामिल होने के बाद सम्राट चौधरी का कद तेजी से बढ़ा। पार्टी ने उन्हें बिहार भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया और अब मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी देकर उन पर बड़ा भरोसा जताया है। वे एक आक्रामक वक्ता होने के साथ-साथ संगठन और जातीय समीकरणों को साधने में भी माहिर माने जाते हैं। निजी जीवन में सम्राट चौधरी एक संतुलित और शांत व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। उनकी पत्नी ममता कुमारी और उनके दो बच्चे (एक बेटा और एक बेटी) इस लंबे राजनीतिक सफर में उनके साथ खड़े रहे हैं।


अमित शाह की भविष्यवाणी हुई सच

भाजपा में उनकी बढ़ती भूमिका के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कहा था कि सम्राट चौधरी एक दिन बड़ा नेता बनेंगे। आज यह बात सच साबित होती दिख रही है, जब वे राज्य के सर्वोच्च पद पर पहुंचने जा रहे हैं।


नई जिम्मेदारी, नई चुनौतियां

सम्राट चौधरी के सामने अब बिहार को नई दिशा देने की बड़ी जिम्मेदारी है। उनके समर्थकों का मानना है कि विभिन्न राजनीतिक दलों में काम करने का अनुभव उन्हें शासन चलाने में मदद करेगा। अब देखना होगा कि “लालू की पाठशाला” से निकले इस नेता के नेतृत्व में बिहार किस दिशा में आगे बढ़ता है।