Bihar News: हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा ने एक बार फिर से लालू परिवार को आईना दिखाया है. तेजस्वी यादव के सवालों पर हम के राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता श्याम सुंदर शरण ने तीखा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि आज जब तेजस्वी यादव और राष्ट्रीय जनता दल के नेता भर्ती प्रक्रियाओं, परीक्षा प्रणाली और सुशासन पर बड़े-बड़े उपदेश देते हैं, तब बिहार की वह पीढ़ी आश्चर्य करती है जिसने लालू-राबड़ी शासन को अपनी आंखों से देखा है और उसकी कीमत चुकाई है।
उन्होंने कहा कि, बिहार के युवाओं को यह जानना चाहिए कि उस दौर की तस्वीर केवल राजनीतिक भाषणों में नहीं, बल्कि फिल्मों, साहित्य और जनचर्चाओं में भी दर्ज है। चर्चित फिल्म अपहरण में जिस तरह भर्ती प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार, पैसे और पहुंच के खेल को दिखाया गया, वह उस समय की व्यवस्था पर उठते सवालों और जनभावनाओं का प्रतिबिंब था। बहुत सारी फिल्मों ने भी उस दौर में अपराध, राजनीतिक संरक्षण और कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े किए थे। यह संयोग नहीं था कि बिहार की पहचान लंबे समय तक अपहरण उद्योग, रंगदारी और कदाचार की चर्चाओं से जुड़ी रही।
हम प्रवक्ता श्याम सुंदर शरण ने आगे कहा कि,शिक्षक बहाली, दारोगा बहाली, सिपाही भर्ती और अन्य सरकारी नियुक्तियों को लेकर उस दौर में लगातार सवाल उठते रहे। प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय परीक्षाओं तक में कदाचार और प्रभाव के इस्तेमाल की चर्चाएं आम थीं। हजारों युवाओं को लगता था कि योग्यता से अधिक महत्व पहुंच, पैरवी और पैसों का है।
आज जो लोग नैतिकता का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि लालू-राबड़ी शासनकाल में परिवार और सत्ता के इर्द-गिर्द सक्रिय रहे लोगों ने ही समय-समय पर उस दौर की कई परतों को सार्वजनिक किया है। लालू प्रसाद यादव के साले और तेजस्वी यादव के मामा साधु यादव और सुभाष यादव उस दौर की राजनीति में अत्यंत प्रभावशाली माने जाते थे। वर्षों तक सत्ता के केंद्र के निकट रहे ये दोनों नेता आज विभिन्न मंचों पर उस समय की कार्यशैली, सत्ता संरचना और अंदरूनी घटनाओं को लेकर कई गंभीर बातें सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं। राजद के एक तत्कालीन राज्यसभा सांसद यादव जी जो बाद में चलकर जनता दल यू के भी सांसद बने 1999 कि शिक्षक बहाली में कैसे आज के एक बड़े कांग्रेसी नेता के मेल से (तब वो राजद में ही थे ) जबरदस्त सेटिंग किया था जो जगजाहिर है। टेंडर वार के लिए मशहूर था हमारा बिहार जिसपर हमने गंगाजल मूवी देखा भी है।
जब वर्षों तक सत्ता का हिस्सा रहे लोग स्वयं उस दौर की कहानियां और आरोप सामने रखते हैं, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि इतिहास को केवल सोशल मीडिया अभियान चलाकर नहीं बदला जा सकता। जिन लोगों ने उस व्यवस्था को भीतर से देखा, वही आज उसके अनेक पहलुओं का उल्लेख कर रहे हैं। इसलिए जनता के सामने उठने वाले सवालों को केवल राजनीतिक साजिश बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।
इसलिए आज तेजस्वी यादव को यह समझना होगा कि यदि उनकी राजनीति की सबसे बड़ी पूंजी लालू प्रसाद यादव की विरासत है, तो उस विरासत का मूल्यांकन भी होगा। यदि वोट लालू जी के नाम पर मांगे जाएंगे, यदि पार्टी उसी विरासत पर खड़ी होने का दावा करेगी, तो जनता उस शासनकाल के अच्छे-बुरे दोनों पहलुओं का हिसाब भी मांगेगी। विरासत केवल राजनीतिक अधिकार नहीं देती, जवाबदेही भी तय करती है।
आज बिहार की नई पीढ़ी को यह जानने की जरूरत है कि आखिर क्यों उस दौर पर फिल्में बनीं, क्यों अपराध और अपहरण पर आधारित कहानियों में बिहार का संदर्भ बार-बार सामने आया और क्यों उस समय की शासन व्यवस्था को लेकर देशभर में बहस होती रही। इतिहास को मिटाने से वह समाप्त नहीं होता, बल्कि और अधिक प्रश्न खड़े करता है।
नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को नहीं जा सकती। ट्विटर, फेसबुक और ड्रॉइंग रूम की राजनीति से जमीन की सच्चाई नहीं बदलती। जनता ने जंगलराज का दौर भी देखा है और उसके बाद का बदलाव भी देखा है। इसलिए जो लोग आज दूसरों पर उंगली उठा रहे हैं, उन्हें पहले अपने अतीत के आईने में झांकना चाहिए। जनता सब जानती है, सब समझती है और समय आने पर अपना फैसला भी सुनाती है।