Bihar Politics: जीतन राम मांझी की बहू और इमामगंज से हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (से.) की विधायक दीपा कुमारी मांझी ने रोहिणी आचार्य के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में किसी भी परिवार को दूसरों के माता-पिता और बुजुर्गों का अपमान करने का अधिकार नहीं है। दीपा मांझी ने रोहिणी आचार्य से राजसी और सामंती मानसिकता से बाहर आने की नसीहत दी।
दीपा कुमारी मांझी ने कहा कि “रोहिणी आचार्य जी, माता-पिता आपके लिए सम्मानित हैं तो किसी दलित परिवार के माता-पिता भी उतने ही सम्मानित हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि आपके परिवार के बुजुर्ग महान हैं और दलित परिवारों के माता-पिता का कोई महत्व या सम्मान नहीं है। इस राजसी और सामंती मानसिकता से बाहर आइए। लोकतंत्र में किसी परिवार को यह अधिकार नहीं मिलता कि वह दूसरों के माता-पिता और बुजुर्गों का अपमान करे।
आप कहती हैं कि आपके माता-पिता से बढ़कर आपके लिए कोई नहीं। ठीक है, लेकिन मेरे लिए भी मेरे ससुर श्री जीतन राम मांझी जी का सम्मान सर्वोपरि है। और ध्यान रखिए—हमारे परिवार में बेटी और बहू में कोई फर्क नहीं है। बेटी हो या बहू, सम्मान, अधिकार और अपनापन सबके लिए बराबर है। हमारे संस्कारों में बहू को पराया नहीं समझा जाता।
आपके परिवार को आखिर किसने इजाजत दी कि दूसरों के माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों को अपमानित करें? पहले अपनी भाषा का आईना देखिए। क्या जिस तरह की भाषा आपके परिवार के लोग राजनीतिक विरोधियों के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसे किसी सम्मानित परिवार की भाषा कहा जा सकता है?
और यह कैसी राजनीति है कि आप बोलें तो वह ‘एक बेटी का जवाब’ हो और कोई आपको उसी भाषा में जवाब दे तो वह अमर्यादित हो जाए? यह दोहरा मापदंड अब नहीं चलेगा। आप गलत को गलत कहने की बात करती हैं तो यह सिद्धांत अपने परिवार पर भी लागू कीजिए। जो भाषा गलत है, वह आपके लिए भी गलत है और हमारे लिए भी।
और परिवार में बेटियों-बहुओं के सम्मान की बात कर रही हैं तो अपने परिवार के उन प्रसंगों पर भी कभी आत्ममंथन कीजिए, जिनमें बहू-बेटी के साथ रिश्तों और व्यवहार को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठते रहे हैं। हमारे परिवार में ऐसा भेदभाव नहीं है कि बेटे को सबकुछ मिले और बहू-बेटी को अलग कर दिया जाए। हमारे यहाँ बेटी और बहू समान हैं—सम्मान भी बराबर, अधिकार भी बराबर और परिवार में स्थान भी बराबर।”
इसलिए किसी के माता-पिता को अपमानित करने के बाद सम्मान की दुहाई मत दीजिए। जैसा बोलोगी, वैसा ही सुनोगी। अब कोई डरने वाला नहीं है और न ही अपने परिवार के सम्मान पर चोट को चुपचाप सहने वाला है। सम्मान चाहिए तो सम्मान देना भी सीखिए। राजनीति में विरोध कीजिए, खूब कीजिए, लेकिन किसी के माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों को अपमानित करने का अधिकार किसी को नहीं है।