Bihar News: सूबे में राष्टपिता के नाम पर शिक्षण संस्थान है. केंद्रीय स्तर के शिक्षण संस्थान की स्थापना के एक दशक से ज्यादा बीत गए. आज तक भवन का निर्माण नहीं हुआ है. स्थानीय सांसद-नेताओं ने लंबी-चौड़ी बातें की, और चुनाव जीतते गए. पर आज तक केंद्रीय स्तर के शिक्षण संस्थान को अपना भवन नहीं मिला. किराये के मकान से केंद्रीय शिक्षण संस्थान का जैसे-तैसे संचालन किया जा रहा. अब भाजपा के दो सांसदों में क्रेडिट लेने की होड़ मची हुई है. एक सांसद के शिक्षा मंत्री से मुलाकात की तस्वीर देखते ही, दूसरे सांसद की बेचैनी बढ़ गई, बिना देर किए , दूसरे पुराने सांसद ने सोशल मीडिया पर चिट्ठी जारी कर बताय़ा- ''हम आपसे पहले ही मांग कर चुके हैं''.
बीजेपी सांसदों में गजब की प्रतिस्पर्द्धा
खबर, भारतीय जनता पार्टी के दो सांसदों से जुड़ी है. दोनों सांसद एक-दूसरे के पड़ोसी हैं. एक सांसद पुराने हैं तो दूसरे वाले भी कम नहीं, खानदानी नेता हैं. पिता भी सांसद थे. चौथी बार जीत कर माननीय बने हैं. हालांकि दोनों में एक समानता है, प्रदेश इकाई का नेतृत्व कर चुके हैं.
नेताजी की बातें बड़ी-बड़ी,आज तक केंद्रीय संस्थान को नहीं मिला अपना भवन
अब मूल खबर पर आते हैं. दरअसल, केंद्रीय स्तर का शिक्षण संस्थान वर्तमान राज्य/केंद्र सरकार और स्थानीय सांसद को मुंह चिढ़ा रहा. बिना भवन के ही एक दशक से ज्यादा वक्त से संचालन हो रहा. जिस पुराने सांसद के संसदीय मुख्य़ालय में उक्त शिक्षण संस्थान है, उन्होंने सिर्फ बातें की. अगर सिर्फ बातें नहीं की जाती, प्रयास किया जाता तो उक्त केंद्रीय शिक्षण संस्थान को अपना भवन मयस्सर हो जाता. दुखद पहलू यह कि इतने सालों बाद भी सिर्फ बातें हुई, काम नहीं.
पड़ोसी सांसद ने शिक्षा मंत्री से मुलाकात तो पुराने नेताजी (सांसद) की बढ़ी बेचैनी
अब पड़ोसी सांसद जिनका तीन विधानसभा क्षेत्र उक्त जिला (जहां शिक्षण संस्थान है) में पड़ता है. उन्होंने बीड़ा उठाया है. खबर लिखने से एक दिन पहले भाजपा के उक्त सांसद ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मुलाकात की है. मुलाकात केंद्रीय शिक्षण संस्थान के भवन निर्माण को लेकर थी. सांसद ने केंद्रीय मंत्री से कहा कि 10 वर्षों बाद भी केंद्रीय शिक्षण संस्थान अपने भवन की राह देख रहा है. हमने संकल्प लिया है कि अगले दो वर्षों में शिक्षण संस्थान का अपना भवन हो. उक्त सांसद ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के मुलाकात के दौरान की तस्वीर भी पोस्ट कर दी. बस क्या था, उस जिले में हलचल तेज हो गई. पुराने नेताजी (सांसद) की बेचैनी बढ़ गई। आनन-फानन में उन्होंने (पुराने नेताजी) ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री को चिट्ठी लिख डाली. लिखा-केंद्रीय शिक्षण संस्थान जो गांधीजी के नाम पर है, के स्थाई परिसर का निर्माण कराया जाए. इसके बाद उन्होंने शिक्षा मंत्री को लिखी गई चिट्ठी को सोशल मीडिया पर शेयर किया. हालांकि पुराने नेताजी ने जो चिट्ठी शेयर किया वो 20 दिन पुरानी चिट्ठी है.
भाजपा के दोनों सांसदों के अपने-अपने दावे
सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की है कि पड़ोसी सांसद की शिक्षा मंत्री से मुलाकात के बाद पुराने नेताजी (सांसद) को भी अपनी सक्रियता दिखाने की जरूरत महसूस हुई। आखिर जनता के बीच यह संदेश भी तो जाना चाहिए कि मुद्दों को लेकर कौन कितना गंभीर है। ऐसे में चिट्ठी लिखकर अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश की गई।
काम से ज्यादा श्रेय की चिंता
राजनीति में जनता के सवालों को उठाना जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार, स्कूलों की समस्याओं का समाधान और विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएं दिलाना प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन जब किसी मुद्दे पर एक जनप्रतिनिधि की पहल के बाद दूसरे की सक्रियता अचानक तेज होती दिखाई दे, तो राजनीतिक श्रेय की चर्चा होना स्वाभाविक है।
सवाल यह है कि क्या चिट्ठी पहले से लिखने की तैयारी थी या फिर पड़ोसी सांसद की सक्रियता देखकर तत्काल कदम उठाया गया? क्या नेताजी वास्तव में शिक्षा से जुड़े मुद्दे को लेकर चिंतित हैं या फिर इस मामले में अपना नाम भी दर्ज कराना चाहते हैं?बहरहाल, पड़ोसी सांसद की मुलाकात और उसके बाद धोती वाले नेताजी की चिट्ठी ने सियासी हलकों में चर्चाओं को हवा दे दी है। अब देखना होगा कि इस पूरे मामले में केंद्रीय शिक्षण संस्थान के भवन निर्माण का काम आगे बढ़ता है या नहीं?