झारखंड के घने जंगलों में वर्षों तक दहशत का पर्याय बना रहा कुख्यात नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा आज खुद ही संकट में फंसा हुआ है। एक करोड़ रुपये का इनामी यह नक्सली अब ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है, जहां न उसके पास पर्याप्त हथियार पहुंच पा रहे हैं और न ही खाने-पीने का इंतजाम हो पा रहा है। सुरक्षा बलों ने उस पर ऐसा शिकंजा कसा है कि उसका बच निकलना लगभग नामुमकिन माना जा रहा है।
जंगल में चारों तरफ से घेरा
पश्चिम सिंहभूम जिले के सारंडा जंगल में मिसिर बेसरा और उसके साथ मौजूद करीब 50 माओवादियों को घेर लिया गया है। सुरक्षा एजेंसियों ने करीब 10 किलोमीटर के दायरे में घेराबंदी कर सभी रास्तों को सील कर दिया है। जंगल के हर संभावित रास्ते पर जवान तैनात हैं, जिससे नक्सलियों के भागने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सीमाओं को भी कड़ी निगरानी में रखा गया है, ताकि कोई भी सदस्य भागकर दूसरे राज्यों में न जा सके।
जंगल बना जाल, खाने तक के लाले
जो जंगल कभी मिसिर बेसरा के लिए सुरक्षित ठिकाना हुआ करते थे, वही अब उसके लिए जाल बन चुके हैं। लगातार चल रहे अभियान के कारण उसके पास रसद की भारी कमी हो गई है। बताया जा रहा है कि उसके साथी आसपास के गांवों में जाकर लोगों से चुपचाप अनाज मांग रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि गिरोह अब बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुका है और लंबे समय तक इस घेरे में टिक पाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है।
रुक-रुक कर जारी है मुठभेड़
सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच रुक-रुक कर मुठभेड़ भी जारी है। जवान धीरे-धीरे घेरा और छोटा कर रहे हैं, जिससे दबाव लगातार बढ़ रहा है। इस अभियान में सीआरपीएफ, कोबरा बटालियन और झारखंड जगुआर के जवान शामिल हैं, जो कई दिनों से लगातार ऑपरेशन चला रहे हैं। हाल ही में नक्सलियों द्वारा बिछाए गए आईईडी विस्फोट में कुछ जवान घायल भी हुए थे, लेकिन इसके बावजूद अभियान की रफ्तार धीमी नहीं हुई है।
कौन है मिसिर बेसरा
मिसिर बेसरा को लंबे समय से नक्सल संगठन का बड़ा चेहरा माना जाता रहा है। वह प्रतिबंधित माओवादी संगठन के पूर्वी क्षेत्रीय ब्यूरो का प्रमुख कमांडर है और कई बड़ी घटनाओं में उसकी संलिप्तता रही है। सुरक्षा एजेंसियों के लिए वह लंबे समय से एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। हालांकि अब जिस तरह से उसे घेरा गया है, उससे यह माना जा रहा है कि यह उसके नेटवर्क के अंत की शुरुआत हो सकती है।
अब सिर्फ दो ही रास्ते
मौजूदा हालात में बेसरा के सामने दो ही विकल्प बचे हैं—या तो वह मुठभेड़ में मारा जाए या फिर आत्मसमर्पण कर दे। सुरक्षा बलों का मानना है कि लगातार बढ़ते दबाव और संसाधनों की कमी के कारण वह ज्यादा समय तक नहीं टिक पाएगा।
बेटे की भावुक अपील
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भावुक पहलू उसका परिवार है। बताया जा रहा है कि उसके बेटे और भाई ने उसे कई बार चिट्ठी लिखकर आत्मसमर्पण करने की अपील की है। परिवार का कहना है कि उनका उससे वर्षों से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि वह हथियार छोड़कर सामान्य जीवन में लौट आए। उसका बेटा, जो दक्षिण भारत में एक साधारण नौकरी करता है, अपने पिता से बार-बार गुहार लगा चुका है कि वह इस रास्ते को छोड़ दे।
नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक मोड़
सरकार भी देश को नक्सलवाद से मुक्त करने के लिए लगातार अभियान चला रही है। कई राज्यों में माओवादी या तो मारे जा चुके हैं या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है। ऐसे में मिसिर बेसरा उन आखिरी बड़े नक्सली चेहरों में से एक है, जिस पर अब निर्णायक कार्रवाई चल रही है।