EAST CHAMPARAN: बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के कल्याणपुर प्रखंड के मंगलापुर गांव की 103 वर्षीय हबीबन को आखिरकार 32 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अपनी जमीन पर कब्जा मिल गया। हालांकि इंसाफ मिलने की खुशी के साथ-साथ दिल में एक दुख भी है। वो यह कि जिस जमीन को पाने के लिए उन्होंने अपने पति नईमुल्लाह अंसारी के साथ संघर्ष किया, उस जीत को देखने के लिए उनके पति अब इस दुनिया में नहीं हैं।


गहना बेचकर खरीदी थी जमीन

हबीबन और उनके पति नईमुल्लाह अंसारी के पास घर के अलावा कोई जमीन नहीं थी। परिवार का भविष्य सुरक्षित करने के लिए हबीबन ने अपने गहने और वर्षों की जमा-पूंजी बेच दी। इसके बाद 6 मार्च 1993 को उन्होंने अफाक मियां से एक कट्ठा चार धुर जमीन खरीदी थी। पति-पत्नी का सपना था कि इसी जमीन पर वो अपना आशियाना बनाएंगे।


चचेरे भाई ने उसी जमीन पर करा ली दूसरी रजिस्ट्री

जमीन खरीदने के महज दो दिन बाद, 8 मार्च 1993 को नईमुल्लाह के चचेरे भाई लियाकत अंसारी ने उसी जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हो गया और मामला कोर्ट पहुंच गया।


सिविल कोर्ट से हाई कोर्ट तक चली लड़ाई

वर्ष 1994 में नईमुल्लाह ने मोतिहारी सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया, जहां फैसला उनके पक्ष में आया। इसके बाद मामला जिला जज की अदालत पहुंचा और वर्ष 2004 में वहां भी नईमुल्लाह के पक्ष में फैसला आया। हालांकि, लियाकत अंसारी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए वर्ष 2010 में पटना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पटना हाई कोर्ट में भी वर्षों तक सुनवाई चली और अंततः अदालत ने नईमुल्लाह के पक्ष में फैसला सुनाया।


लेकिन पति के निधन के बाद मिला न्याय

हाई कोर्ट में मामला लंबा खिंचने के दौरान करीब आठ वर्ष पहले नईमुल्लाह अंसारी का निधन हो गया। इसके बावजूद हबीबन ने न्याय की उम्मीद नहीं छोड़ी। हाई कोर्ट के फैसले के बाद स्थानीय मुंसिफ कोर्ट ने इजरायवाद के तहत आदेश जारी किया और विजयी पक्ष को जमीन पर कब्जा दिलाने का निर्देश दिया।


103 साल की उम्र में मिला अपनी जमीन पर कब्जा

अदालती प्रक्रिया पूरी होने के बाद रविवार को पुलिस, दंडाधिकारी और कोर्ट के प्रतिनिधि की मौजूदगी में हबीबन को उनकी जमीन पर विधिवत कब्जा दिलाया गया। 32 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार उन्हें उनका हक मिल गया।हबीबन और उनका परिवार इस फैसले से खुश है, लेकिन उनकी आंखों में यह दर्द भी साफ झलकता है कि जिस जमीन के लिए उन्होंने और उनके पति ने संघर्ष किया, उस जीत के गवाह बनने के लिए नईमुल्लाह आज उनके साथ नहीं हैं।