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24-Feb-2026 06:12 PM
By First Bihar
Indian Army Inspirational Story: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली सुष्मिता की जिंदगी कभी एक साधारण स्कूल टीचर की तरह चल रही थी। शादी, परिवार और छोटे बेटे के साथ खुशहाल जीवन—सब कुछ सामान्य था। लेकिन 17 मार्च 2016 की एक खबर ने उनकी दुनिया बदल दी। उनके पति, भारतीय सेना के मेजर नीरज पांडे, ड्यूटी के दौरान शहीद हो गए। उस दिन के बाद सुष्मिता ने टूटने के बजाय खुद को नई दिशा देने का फैसला किया। आज उनकी कहानी साहस, समर्पण और आत्मबल की मिसाल बन चुकी है।
साधारण जिंदगी से असाधारण सफर तक
साल 2010 में सुष्मिता की शादी सेना के अधिकारी मेजर नीरज पांडे से हुई थी। 2013 में उनके बेटे रुद्रांश का जन्म हुआ। परिवार में खुशियां थीं और भविष्य के कई सपने। नीरज अक्सर अपनी पत्नी से कहते थे “जीवन में हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना।” उस समय शायद सुष्मिता ने इन शब्दों की गहराई को पूरी तरह महसूस नहीं किया था।
मेजर नीरज पांडे भारतीय सेना के कॉर्प्स ऑफ सिग्नल्स में तैनात थे। उन्हें भारत-चीन सीमा पर एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अरुणाचल प्रदेश में ड्यूटी के दौरान उनका काफिला प्राकृतिक आपदा की चपेट में आ गया। गंभीर चोटों के बावजूद उन्होंने अंतिम क्षण तक साहस दिखाया, लेकिन आखिरकार वे शहीद हो गए। उस समय उनकी उम्र महज 32 वर्ष थी।
आंसुओं की जगह लिया एक संकल्प
पति की शहादत की खबर ने सुष्मिता को भीतर तक झकझोर दिया। लेकिन उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया। उन्होंने ठान लिया कि वे अपने पति के अधूरे सपनों को आगे बढ़ाएंगी। एक स्कूल टीचर से सेना अधिकारी बनने का फैसला आसान नहीं था, वह भी 31 वर्ष की उम्र में और एक छोटे बच्चे की मां होते हुए।
पति की शहादत के मात्र छह महीने बाद सुष्मिता सेवा चयन बोर्ड (SSB) की परीक्षा में शामिल हुईं। पहले ही प्रयास में उनका चयन हो गया। 2017 में उन्होंने चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) में प्रशिक्षण शुरू किया।
चुनौतियां, संघर्ष और जीत
ट्रेनिंग के दौरान उनके सामने कई चुनौतियां थीं। मां बनने के बाद उनका वजन बढ़ चुका था और वे अन्य कैडेट्स की तुलना में उम्र में भी बड़ी थीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। कठिन प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने लगभग 20 किलो वजन कम किया और हर शारीरिक व मानसिक परीक्षा में खुद को साबित किया।
इस दौरान उनका बेटा रुद्रांश नाना-नानी के पास रहा। मां-बेटे की बातचीत सीमित थी, लेकिन सुष्मिता के मन में एक ही लक्ष्य था—अपने बेटे के लिए साहस की मिसाल बनना।
उसी रेजिमेंट में अफसर बनीं
2018 में सुष्मिता भारतीय सेना में अधिकारी बनीं। सबसे भावुक पल वह था जब उन्हें उसी कॉर्प्स ऑफ सिग्नल्स में नियुक्ति मिली, जहां उनके पति सेवा दे रहे थे। यह सिर्फ एक पोस्टिंग नहीं थी, बल्कि एक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प था।
आज कैप्टन सुष्मिता मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित मिलिट्री कॉलेज ऑफ टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग (मऊ) में तैनात हैं। वे अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभा रही हैं।
बेटे के लिए एक सपना
सुष्मिता चाहती हैं कि उनका बेटा रुद्रांश भी बड़ा होकर भारतीय सेना में शामिल हो। वह आर्मी पब्लिक स्कूल में पढ़ाई कर रहा है और अपनी मां की बहादुरी पर गर्व करता है।
सुष्मिता की कहानी बताती है कि हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, यदि मन में दृढ़ निश्चय हो तो इंसान असंभव को भी संभव बना सकता है। यह सिर्फ एक शहीद की पत्नी की कहानी नहीं, बल्कि उस महिला की गाथा है जिसने दुख को ताकत में बदल दिया और वर्दी पहनकर अपने पति को सच्ची श्रद्धांजलि दी।