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15-Mar-2026 06:57 PM
By First Bihar
BRABU News: बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) की सीनेट बैठक शनिवार को काफी हंगामेदार रही। विश्वविद्यालय के प्रशासनिक फैसलों को लेकर सीनेटरों ने खुलकर विरोध जताया और बैठक के दौरान कई बार तीखी बहस देखने को मिली। मुख्य विवाद पूर्व प्रॉक्टर प्रो. विनय शंकर राय को नैक (NAAC) का सलाहकार बनाए जाने और कुछ अधूरे कॉलेजों को संबद्ध करने के प्रस्ताव को लेकर हुआ।
सीनेट हॉल में आयोजित इस बैठक में कई जनप्रतिनिधियों और सीनेटरों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के फैसलों पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि कुछ निर्णय ऐसे तरीके से लिए गए हैं जो विश्वविद्यालय के नियमों और परिनियमों के खिलाफ हैं।
रिश्तेदार को सलाहकार बनाने पर उठा विवाद
बैठक के दौरान सबसे बड़ा मुद्दा पूर्व प्रॉक्टर प्रो. विनय शंकर राय को नैक का सलाहकार बनाए जाने का रहा। इस फैसले को लेकर सीनेटरों ने कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय से तीखे सवाल किए।
विधान पार्षद प्रो. संजय सिंह और सीनेटर मनोज वत्स ने पूछा कि आखिर किस नियम और प्रक्रिया के तहत प्रो. विनय शंकर राय को यह जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि उन्हें सीनेट की बैठक में किस अधिकार के तहत बैठाया गया।
इस पर कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय ने जवाब देते हुए कहा कि यह निर्णय राजभवन से बातचीत के बाद लिया गया है। हालांकि इस जवाब से सीनेटर संतुष्ट नहीं हुए।
सीनेटर मनोज वत्स ने कुलपति से इस फैसले से संबंधित लिखित आदेश दिखाने की मांग की। उनका कहना था कि अगर राजभवन के निर्देश पर यह फैसला लिया गया है तो उसका कोई आधिकारिक दस्तावेज जरूर होना चाहिए। लेकिन बैठक में ऐसा कोई लिखित आदेश प्रस्तुत नहीं किया गया।
nepotism के लगे आरोप
सीनेटरों ने इस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि कुलपति ने अपने रिश्तेदार को जिम्मेदारी देने के लिए विश्वविद्यालय के नियमों और परिनियमों को नजरअंदाज किया है। विरोध करने वाले सदस्यों का कहना था कि इस तरह के फैसले से विश्वविद्यालय प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं और इससे संस्थान की छवि भी प्रभावित होती है।
इस मुद्दे को लेकर बैठक में करीब आधे घंटे तक हंगामा होता रहा। कई सीनेटरों ने प्रशासन के इस फैसले को गलत बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की। खास बात यह रही कि बैठक में मौजूद किसी भी सदस्य ने इस निर्णय का खुलकर समर्थन नहीं किया।
मीडिया को बैठक से दूर रखने पर भी नाराजगी
सीनेट बैठक के दौरान मीडिया को प्रवेश नहीं देने का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया गया। कई जनप्रतिनिधियों और सीनेटरों ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई।
जदयू विधायक पंकज मिश्रा, सीनेटर मनोज वत्स, केशरी नंदन शर्मा, विधान पार्षद प्रो. संजय सिंह और डॉ. भारत भूषण ने कहा कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। उनका कहना था कि विश्वविद्यालय जैसे संस्थान में पारदर्शिता बेहद जरूरी है और मीडिया को बैठक से बाहर रखना गलत कदम है।
सीनेटरों ने कहा कि यह विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार हुआ है जब मीडिया को पूरी तरह सीनेट बैठक से दूर रखा गया। उन्होंने इसे लोकतंत्र की भावना के खिलाफ बताया और कहा कि “लोकतंत्र की जन्मभूमि में लोकतंत्र की हत्या” जैसी स्थिति बन गई है।
अधूरे कॉलेजों को संबद्ध करने पर भी विवाद
बैठक में चार नए कॉलेजों को विश्वविद्यालय से संबद्ध करने का प्रस्ताव भी रखा गया, जिस पर सीनेटरों ने कड़ा विरोध जताया। विधान पार्षद प्रो. संजय कुमार सिंह ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब ये कॉलेज अभी विश्वविद्यालय के तय मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं, तो उन्हें संबद्धता के लिए कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने पूछा कि जब कॉलेज अधूरे हैं और बुनियादी सुविधाएं भी पूरी नहीं हैं, तो संबद्धन कमेटी ने उन्हें पास कैसे कर दिया और सीनेट के सामने प्रस्ताव क्यों लाया गया।
इस पर कुलपति ने जवाब दिया कि कॉलेजों को संबद्धता तभी दी जाएगी जब वे सभी जरूरी मानकों को पूरा करेंगे। हालांकि यह जवाब भी कई सदस्यों को संतोषजनक नहीं लगा और उन्होंने मांग की कि ऐसे कॉलेजों को फिलहाल संबद्धता की प्रक्रिया से बाहर रखा जाए।
किन कॉलेजों को संबद्ध करने का प्रस्ताव
बैठक में जिन कॉलेजों को संबद्ध करने का प्रस्ताव रखा गया था, उनमें चार संस्थान शामिल थे।
रंजीत कुमार प्रकाश डिग्री कॉलेज
अबुल कलाम डिग्री कॉलेज
एबीएम डिग्री कॉलेज
सिकराहना डिग्री कॉलेज
इन कॉलेजों की स्थिति और मानकों को लेकर कई सीनेटरों ने गंभीर सवाल उठाए और कहा कि बिना पूरी जांच के ऐसे फैसले नहीं होने चाहिए।
बजट बढ़ाने के प्रस्ताव पर भी विरोध
सीनेट बैठक में विश्वविद्यालय के बजट को बढ़ाकर 19 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव भी रखा गया। इस प्रस्ताव को लेकर भी कई सदस्यों ने सवाल उठाए।
सीनेटरों का कहना था कि बजट बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण फैसलों में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए। उनका आरोप था कि कई मामलों में नियमों का पालन ठीक तरीके से नहीं किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि अगर विश्वविद्यालय प्रशासन इसी तरह बिना स्पष्ट प्रक्रिया के फैसले लेता रहा तो इससे विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होंगी।
लगातार सवालों के घेरे में विश्वविद्यालय प्रशासन
शनिवार को हुई सीनेट बैठक ने साफ कर दिया कि विश्वविद्यालय प्रशासन के कई फैसले अब सवालों के घेरे में हैं। सीनेटरों ने साफ तौर पर कहा कि विश्वविद्यालय की गरिमा बनाए रखने के लिए नियमों का सख्ती से पालन जरूरी है।