Petro Diesel Price: ईरान युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज उछाल ने दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था पर असर डालना शुरू कर दिया है। इसका सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ा है, जो पूरी तरह आयातित तेल पर निर्भर हैं और जहां सरकारें ईंधन कीमतों को नियंत्रित नहीं करतीं। भारत के पड़ोसी देशों में हालात तेजी से बदले हैं।
ग्लोबल पेट्रोल प्राइसेज डॉट कॉम के ताजा आंकड़ों के मुताबिक म्यांमार में पेट्रोल की कीमतों में 93.9 प्रतिशत और डीजल में 128.5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। फिलीपींस, मलेशिया, कंबोडिया, पाकिस्तान, लाओस और यूएई जैसे देशों में भी पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़े हैं। लाओस में डीजल 169.5 प्रतिशत तक महंगा हो चुका है, जो इस सूची में सबसे ऊपर है।
इन देशों में बढ़ी कीमतों का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ा है। परिवहन महंगा हो गया है, खाद्य वस्तुओं की लागत बढ़ गई है और महंगाई दर तेजी से ऊपर जा रही है। कई देशों में लोग विरोध प्रदर्शन भी कर रहे हैं।
भारत में क्यों बनी हुई है राहत?
इन हालातों के बीच भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें फिलहाल स्थिर बनी हुई हैं। दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब वैश्विक बाजार में तेल महंगा हो रहा है, तो भारत में दाम क्यों नहीं बढ़ रहे?
भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में जरा सी हलचल भी भारत पर असर डालती है। लेकिन भारत में तेल मूल्य निर्धारण पूरी तरह मुक्त बाजार व्यवस्था पर आधारित नहीं है। यहां सरकार और सरकारी तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बढ़ोतरी का असर तुरंत जनता तक नहीं पहुंचने देतीं।
सरकार और तेल कंपनियां कैसे संभालती हैं दबाव?
भारत में इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियां तेल वितरण का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करती हैं। जब कच्चे तेल की कीमतें अचानक बढ़ती हैं, तो ये कंपनियां कई बार कुछ समय तक घाटा सहकर कीमतों को स्थिर रखती हैं।
इसके अलावा केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी और टैक्स में बदलाव कर बाजार को संतुलित करती है। कई बार राज्यों के वैट टैक्स भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के बावजूद भारत में उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिल जाती है।
कितने समय तक मिल सकती है राहत?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में मौजूदा राहत अस्थायी है। अगर ब्रेंट क्रूड की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियों का घाटा बढ़ना तय है। ऐसी स्थिति में सरकार के पास दो ही रास्ते बचते हैं—या तो टैक्स में कटौती की जाए, या फिर उपभोक्ताओं पर बोझ डालते हुए पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए जाएं।
अभी भारत को राहत इसलिए भी मिल रही है क्योंकि रूस से रियायती दरों पर तेल आयात जारी है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूसी तेल खरीद बढ़ाई थी, जिससे आयात लागत में कुछ संतुलन बना रहा।
अगर युद्ध लंबा चला तो क्या होगा?
अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचता है और पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति केंद्र है। वहां संकट गहराने का मतलब है कि पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जाएंगी।
ऐसी स्थिति में भारत के लिए कीमतों को नियंत्रित रखना मुश्किल हो जाएगा। पेट्रोल-डीजल महंगा होने पर ट्रांसपोर्ट महंगा होगा, ट्रांसपोर्ट महंगा होने से सब्जियां, राशन, दूध, निर्माण सामग्री—सब कुछ महंगा हो जाएगा। इसका असर सीधे आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ेगा।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
अगर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, तो सबसे पहले असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर पड़ेगा। रोज आने-जाने वालों का खर्च बढ़ेगा। माल ढुलाई महंगी होने से बाजार में हर वस्तु की कीमत बढ़ेगी। स्कूल बस फीस से लेकर ऑनलाइन डिलीवरी चार्ज तक महंगे हो सकते हैं।
महंगाई बढ़ने पर रिजर्व बैंक भी ब्याज दरों में बदलाव कर सकता है, जिससे होम लोन और वाहन लोन की EMI पर असर पड़ सकता है।
फिलहाल राहत, लेकिन सतर्क रहने की जरूरत
फिलहाल भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर हैं और आम लोगों को राहत मिल रही है। लेकिन यह राहत स्थायी नहीं मानी जा रही। अंतरराष्ट्रीय बाजार में युद्ध और तेल संकट की दिशा आने वाले दिनों में तय करेगी कि भारतीय उपभोक्ताओं को यह राहत कितने समय तक मिलेगी। लेकिन अगर वैश्विक संकट और गहराया, तो आने वाले हफ्तों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल राहत है, मगर खतरे की घंटी बज चुकी है।