Bihar Panchayat News : सारण जिले के दरियापुर प्रखंड की बेला पंचायत में पंचायत विकास दिवस के मौके पर जो तस्वीर सामने आई, उसने पंचायत व्यवस्था और सरकारी दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस पंचायत सरकार भवन को गांव की समस्याओं के समाधान का स्थानीय केंद्र होना चाहिए, वहां सुबह 11 बजे ही ताला लटका मिला। अब सवाल यह है कि जब पंचायत सरकार भवन ही बंद रहेगा तो गांव की सरकार आखिर चलेगी कैसे?

बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश ने पंचायत विकास दिवस के अवसर पर बेला पंचायत स्थित पंचायत सरकार भवन का औचक निरीक्षण किया। उम्मीद थी कि पंचायत भवन में अधिकारी, कर्मचारी और जनप्रतिनिधि मौजूद मिलेंगे और ग्रामीणों से जुड़ी योजनाओं एवं समस्याओं पर काम होता नजर आएगा। लेकिन मौके पर मिला नजारा इसके ठीक उलट था।

भवन के दरवाजे पर ताला था और अंदर सरकारी व्यवस्था गायब।

मंत्री ने पंचायत सरकार भवन बंद मिलने पर नाराजगी जताई। इतना ही नहीं, पंचायत में ग्राम सभा का आयोजन नहीं होने की बात भी सामने आई। इसके बाद मंत्री ने मुखिया, BDO और पंचायत सचिव से स्पष्टीकरण मांगने का निर्देश दिया।अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पंचायत भवन में ताला क्यों लगा था। बड़ा सवाल यह है कि अगर पंचायत सरकार भवन ही जनता के लिए बंद रहेगा तो ग्रामीण अपनी शिकायत लेकर आखिर जाएंगे कहां?

पंचायत दिवस पर ही पंचायत भवन बंद, इससे बड़ा मजाक क्या होगा?

पंचायत विकास दिवस का उद्देश्य गांव की सरकार को मजबूत करना, ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ाना और पंचायत स्तर पर विकास कार्यों को गति देना है। लेकिन उसी दिन पंचायत सरकार भवन में ताला मिलना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या पंचायत विकास दिवस केवल कागजों और सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित रह गया है? क्या पंचायत भवन खोलना भी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी नहीं है? क्या ग्रामीणों को अपने काम के लिए पंचायत भवन के दरवाजे खुलने का इंतजार करना पड़ेगा? और अगर मंत्री के औचक निरीक्षण के दौरान यह हाल है, तो बिना निरीक्षण वाले दिनों में पंचायत सरकार भवन की स्थिति क्या रहती होगी?

ग्राम सभा नहीं हुई तो जनता की आवाज कौन सुनेगा?

पंचायत व्यवस्था में ग्राम सभा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। गांव के विकास से जुड़े फैसलों में ग्रामीणों की भागीदारी इसी माध्यम से सुनिश्चित की जाती है। लेकिन बेला पंचायत में ग्राम सभा आयोजित नहीं किए जाने की बात सामने आने के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या गांव के विकास की योजनाएं जनता से पूछकर बन रही हैं या फिर कागजों पर ही तय हो रही हैं?अगर ग्राम सभा ही नहीं होगी तो ग्रामीण अपनी समस्याएं कहां रखेंगे? किस आधार पर विकास योजनाओं की प्राथमिकता तय होगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या पंचायत की सरकार जनता के बीच चल रही है या सिर्फ सरकारी फाइलों में?

मुखिया, BDO और पंचायत सचिव से जवाब तलब

मंत्री के निर्देश के बाद अब मुखिया, BDO और पंचायत सचिव की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आखिर पंचायत सरकार भवन बंद क्यों था? इसकी जिम्मेदारी किसकी है? ग्राम सभा क्यों नहीं हुई? क्या इसके लिए पहले से कोई व्यवस्था बनाई गई थी? स्पष्टीकरण मांगना कार्रवाई की शुरुआत हो सकती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जवाब मिलने के बाद जिम्मेदारी भी तय होगी? क्योंकि सरकारी व्यवस्था में अक्सर नोटिस निकलता है, जवाब मांगा जाता है और कुछ दिनों बाद मामला फाइलों में दब जाता है। जनता जानना चाहेगी कि इस बार भी ऐसा ही होगा या वास्तव में जिम्मेदारी तय होगी?

मंत्री के निरीक्षण से हड़कंप, लेकिन सवाल जनता का है

मंत्री के औचक निरीक्षण के बाद पंचायत स्तर के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों में हड़कंप मचना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यह है कि हड़कंप सिर्फ मंत्री के आने पर क्यों मचे? क्या पंचायत भवन में कामकाज सिर्फ निरीक्षण के डर से होना चाहिए? क्या अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी सुनिश्चित करने के लिए हर दिन किसी मंत्री का औचक निरीक्षण जरूरी है? अगर व्यवस्था नियमित रूप से ठीक है तो औचक निरीक्षण में ताला मिलने की नौबत क्यों आई?

तंज यही है—'गांव की सरकार' के भवन पर ही ताला!

सरकार गांवों तक विकास पहुंचाने की बात करती है। पंचायतों को स्थानीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी बताया जाता है। लेकिन जब पंचायत सरकार भवन ही बंद मिले तो यह तस्वीर सरकारी दावों पर अपने आप व्यंग्य करती नजर आती है। भवन पंचायत सरकार का, दरवाजे पर ताला और जनता बाहर—फिर गांव की सरकार अंदर कौन चला रहा है? यह सिर्फ एक बंद भवन का मामला नहीं है। यह उस सोच पर सवाल है जिसमें सरकारी संस्थान तो बना दिए जाते हैं, लेकिन उनके नियमित संचालन और जवाबदेही पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। अब देखना होगा कि मंत्री के निर्देश के बाद क्या केवल स्पष्टीकरण की खानापूर्ति होती है या वास्तव में जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाती है। क्योंकि जनता का सीधा सवाल है— जब पंचायत सरकार भवन ही नहीं खुलेगा, तो गांव की सरकार जनता की समस्याएं सुनेगी कब? जब ग्राम सभा ही नहीं होगी, तो गांव के विकास का फैसला होगा कैसे?और सबसे बड़ा सवाल—क्या पंचायत विकास दिवस पर विकास की तस्वीर दिखनी चाहिए थी या पंचायत भवन पर लटका ताला ही पूरी व्यवस्था का आईना बन गया?


रिपोर्ट -  पवन कुमार सिंह