Bihar News: बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के पिपराकोठी में प्रस्तावित वाटर पार्क परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों और प्रशासन के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अपनी पुश्तैनी और खेती योग्य जमीन बचाने की मांग को लेकर किसान एक बार फिर सड़कों पर उतर आए हैं, जहां जमकर विरोध-प्रदर्शन और नारेबाजी देखने को मिली।
इस आंदोलन को अब राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। शुक्रवार को पूर्व मंत्री और विधायक सुधाकर सिंह भी किसानों के समर्थन में धरना-प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने सरकार पर किसानों की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण का आरोप लगाते हुए आंदोलन को और तेज करने का ऐलान किया।
प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने “जमीन हमारी है, किसी की जागीर नहीं”, “नहीं चाहिए वाटर पार्क, बचाओ हमारी खेती” और “जबरन भूमि अधिग्रहण बंद करो” जैसे नारे लगाए।
किसानों का कहना है कि वे वर्षों से इसी जमीन पर खेती कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं और यही उनकी आजीविका का मुख्य साधन है। उनका आरोप है कि सरकार विकास के नाम पर उनकी उपजाऊ जमीन छीनने की कोशिश कर रही है। किसानों का यह भी कहना है कि पहले उनकी जमाबंदी रद्द कर दी गई और बाद में भूमि की नापी शुरू कर दी गई। ग्रामीणों के अनुसार, बिना पर्याप्त सूचना और सहमति के उन पर जमीन खाली करने का दबाव बनाया जा रहा है।
प्रदर्शन को संबोधित करते हुए सुधाकर सिंह ने कहा कि किसानों की सहमति के बिना किसी भी कीमत पर भूमि अधिग्रहण स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसानों की राय और अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण की कोशिश की तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। साथ ही उन्होंने 22 जून 2026 की घटना का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया था, जिसमें कई लोग घायल हुए।
प्रदर्शन में शामिल किसानों ने बताया कि जब प्रशासन भूमि सर्वेक्षण के लिए पहुंचा था, तब कई ग्रामीण विरोध में खेतों में लेट गए थे। उनका कहना है कि खेती ही उनके जीवन का आधार है और जमीन छिनने पर उनके सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।
किसानों ने स्पष्ट किया कि वे विकास परियोजनाओं के विरोधी नहीं हैं, लेकिन बिना सहमति उनकी उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण स्वीकार नहीं करेंगे। उनका कहना है कि किसी भी परियोजना से पहले सरकार को किसानों से संवाद करना चाहिए और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।
फिलहाल पिपराकोठी का यह भूमि विवाद राजनीतिक और सामाजिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। किसान भूमि अधिग्रहण रोकने, जमाबंदी बहाल करने और 22 जून की पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच की मांग पर अड़े हुए हैं। वहीं प्रशासन की ओर से इस मामले पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
रिपोर्ट- सोहराब आलम, मोतिहारी