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26-Feb-2026 01:16 PM
By First Bihar
BIHAR NEWS : बिहार विधान परिषद में एक बयान को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के एमएलसी सुनील कुमार सिंह द्वारा दिए गए कथित बयान ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस को जन्म दे दिया। जानकारी के मुताबिक, सुनील कुमार सिंह ने कहा था कि सदन की कार्रवाई के अंतिम दिन “ऑर्डर से शराब मंगवाएंगे।” उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में काफी प्रतिक्रिया देखने को मिली और विधान परिषद का माहौल भी गरमा गया।
इस पर जनता दल (यूनाइटेड) (जदयू) के एमएलसी नीरज कुमार ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इस तरह का बयान न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि सदन की गरिमा के खिलाफ भी है। नीरज कुमार ने तर्क दिया कि एक जनप्रतिनिधि जब शपथ लेता है तो वह संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा की शपथ लेता है। ऐसे में सार्वजनिक मंच से इस प्रकार की टिप्पणी करना अनुचित है। उन्होंने यह भी कहा कि धारा 30 के तहत इस तरह के बयान पर 5 से 10 साल तक की सजा का प्रावधान हो सकता है। उनके अनुसार, जनप्रतिनिधियों को अपने शब्दों का चयन बेहद सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि उनके बयान का व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ता है।
नीरज कुमार की आपत्ति के बाद सदन में माहौल और भी तनावपूर्ण हो गया। जवाब देते हुए सुनील कुमार सिंह ने पलटवार किया और आरोप लगाया कि जनता दल (यू) ने ‘किंग महेंद्र’ नामक व्यक्ति से पांच वर्षों तक 99 लाख रुपये लिए। उनके इस आरोप से सत्ता पक्ष के सदस्य आक्रोशित हो उठे और सदन में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक हुई और कार्यवाही के दौरान कई बार व्यवधान की स्थिति बनी।
इस बीच उपसभापति रामबचन राय ने हस्तक्षेप करते हुए सुनील कुमार सिंह को संयम बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय पहले भी सुनील कुमार सिंह पर कड़ी टिप्पणी कर चुका है, इसलिए उन्हें बोलते समय विशेष सावधानी रखनी चाहिए। उनका कहना था कि सार्वजनिक जीवन में शब्दों की मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है, खासकर तब जब व्यक्ति संवैधानिक पद पर आसीन हो।
रामबचन राय की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए सुनील कुमार सिंह ने कहा, “हमाम में सभी नंगे हैं। मैं सभी के बारे में एक-एक बात जानता हूं।” इस बयान ने विवाद को और हवा दे दी। उनके इस कथन को राजनीतिक हलकों में एक व्यापक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने यह जताने की कोशिश की कि किसी एक पक्ष को नैतिकता का पाठ पढ़ाने का अधिकार नहीं है।
यह पूरा घटनाक्रम बिहार की राजनीति में भाषा और आचरण की मर्यादा को लेकर फिर से चर्चा का विषय बन गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि जनप्रतिनिधि संयमित और जिम्मेदार भाषा का प्रयोग करें। सदन केवल बहस और मतभेद का मंच नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक भी है। ऐसे में विवादित और उत्तेजक बयानों से न केवल सदन की कार्यवाही प्रभावित होती है, बल्कि जनता के बीच भी गलत संदेश जाता है।
फिलहाल इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी जारी है। सत्ता पक्ष जहां इसे सदन की गरिमा का प्रश्न बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक द्वेष और मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश करार दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या दोनों पक्ष इस पर किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंच पाते हैं या नहीं।