Bihar News : बिहार की राजनीति में इन दिनों तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के विधान पार्षद बंशीधर ब्रजवासी को लेकर जबरदस्त चर्चा है। भाजपा में शामिल होने की खबर सामने आने के कुछ ही घंटों बाद उनके बदले हुए बयान ने पूरे मामले को उलझा दिया है। पहले उन्होंने खुले तौर पर भाजपा की सदस्यता लेने की बात स्वीकार की, लेकिन बाद में पलटते हुए साफ कहा कि भाजपा की सदस्यता उन्होंने नहीं ली है। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर बंशीधर ब्रजवासी भाजपा में शामिल हुए हैं या फिर उन्होंने सिर्फ एनडीए को समर्थन दिया है?


इस राजनीतिक घटनाक्रम ने बिहार में सियासी हलचल बढ़ा दी है। खास बात यह है कि सदस्यता लेने की बात स्वीकार करने के बाद अब ब्रजवासी का इनकार सामने आया है। वहीं, सदस्यता की रसीद का मामला भी चर्चा में है। ऐसे में उनके बदले हुए रुख ने भाजपा से लेकर विपक्ष तक को सवाल उठाने का मौका दे दिया है।


दरअसल, तिरहुत स्नातक एमएलसी बंशीधर ब्रजवासी के भाजपा में शामिल होने की खबर सामने आई थी। इसके बाद जब उनसे सदस्यता को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, 'जी बिल्कुल, मैंने सदस्यता ली है।' इस बयान के बाद उनके भाजपा में जाने की बात लगभग स्पष्ट मानी जाने लगी। लेकिन कुछ ही घंटे बाद उनका दूसरा बयान सामने आया। इस बार उन्होंने कहा कि क्लियर कट रहिए, भाजपा की सदस्यता हमने नहीं ली है।


एक ही दिन में आए इन दो बयानों ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर सदस्यता नहीं ली तो पहले उन्होंने हामी क्यों भरी? अगर सदस्यता ली है तो अब इनकार क्यों कर रहे हैं? सदस्यता की रसीद की चर्चा के बीच यह मामला और पेचीदा हो गया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि भाजपा और बंशीधर ब्रजवासी की ओर से इस पूरे विवाद पर आगे क्या सफाई आती है।


बंशीधर ब्रजवासी का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह किसी पार्टी के टिकट पर नहीं, बल्कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधान परिषद पहुंचे हैं। ऐसे में भाजपा की सदस्यता लेने का दावा सामने आते ही दल-बदल कानून को लेकर भी सवाल उठने लगे। संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के अनुसार, चुनाव जीतने के बाद निर्दलीय निर्वाचित सदस्य यदि किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करता है तो उसकी विधान परिषद सदस्यता पर खतरा पैदा हो सकता है। यही वजह है कि सदस्यता लेने और नहीं लेने के बीच का अंतर उनके लिए बेहद अहम हो गया है।


बंशीधर ब्रजवासी की राजनीतिक पहचान शिक्षकों के मुद्दों से बनी है। वह लंबे समय तक शिक्षकों के अधिकारों और उनकी मांगों को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। शिक्षा विभाग के पूर्व अपर मुख्य सचिव केके पाठक के कार्यकाल में भी वह अपने विरोध और बेबाक अंदाज को लेकर चर्चा में आए थे। शिक्षकों के मुद्दे पर विभाग से टकराव के बाद उन्हें निलंबन जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने राजनीतिक मैदान में अपनी अलग पहचान बनाई।


साल 2024 में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के उपचुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज कर उन्होंने राजनीतिक दलों को चौंका दिया था। इसके बाद 2026 के चुनाव में भी उन्होंने अपनी जीत दोहराई। इस बार उन्होंने जेडीयू समर्थित उम्मीदवार अभिषेक झा को हराकर विधान परिषद में जगह बनाई। ब्रजवासी को 31,832 वोट मिले, जबकि अभिषेक झा को 22,685 वोट प्राप्त हुए। इस तरह उन्होंने 9,147 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।


अब वही बंशीधर ब्रजवासी भाजपा में शामिल होने की खबर और फिर उससे इनकार को लेकर सुर्खियों में हैं। भाजपा के लिए यह घटनाक्रम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रजवासी ने हालिया चुनाव में जेडीयू उम्मीदवार को हराया था। वहीं, विपक्ष इसे जेडीयू के लिए झटका बता रहा है और पूरे मामले पर सवाल उठा रहा है।


फिलहाल बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बंशीधर ब्रजवासी भाजपा के सदस्य बने हैं या केवल समर्थन देने तक सीमित हैं? पहले सदस्यता की हामी, फिर साफ इनकार और बीच में सदस्यता रसीद की चर्चा ने इस पूरे मामले को सियासी पहेली बना दिया है। अब देखना होगा कि इस पर भाजपा का आधिकारिक रुख क्या होता है और ब्रजवासी अपने दोनों बयानों के बीच पैदा हुए विरोधाभास को कैसे स्पष्ट करते हैं।