Bihar News : रिशु श्री भ्रष्टाचार और कथित टेंडर घोटाला मामले में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे बिहार के प्रशासनिक गलियारों में कई पुराने फैसले सवालों के घेरे में आते जा रहे हैं। विशेष निगरानी इकाई (SVU) द्वारा पूर्व मुख्य अभियंता तारिणी दास की गिरफ्तारी के बाद अब चर्चा केवल भ्रष्टाचार के आरोपों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उन ताकतवर लोगों तक पहुंच गई है जिन्होंने उन्हें लगातार संरक्षण दिया और रिटायरमेंट के बाद भी मलाईदार पदों पर बनाए रखा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर भवन निर्माण विभाग के रिटायर मुख्य अभियंता तारिणी दास के पीछे वह कौन सी ताकत थी, जिसके दम पर नियमों को दरकिनार कर फैसले लिए गए? क्या केवल एक इंजीनियर इतना प्रभावशाली हो सकता है कि कैबिनेट की अंतिम स्वीकृति से पहले ही उसकी संविदा नियुक्ति का आदेश जारी हो जाए? या फिर इसके पीछे किसी बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण की भूमिका थी?
दस्तावेज बताते हैं कि तारिणी दास भवन निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता पद से 31 अक्टूबर 2024 को सेवानिवृत्त हो चुके थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्हें 9 नवंबर 2024 को ही दो साल के लिए संविदा पर नियुक्त कर दिया गया, जबकि इस प्रस्ताव को राज्य मंत्रिपरिषद की मंजूरी 19 नवंबर को मिली। सवाल उठता है कि जब कैबिनेट की मंजूरी ही नहीं मिली थी तो इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? आखिर किसके दबाव में यह फैसला लिया गया?
यहीं नहीं, संविदा नियुक्ति मिलते ही तारिणी दास को भवन निर्माण निगम लिमिटेड के मुख्य महाप्रबंधक का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया। आमतौर पर सेवानिवृत्त अधिकारियों को एक पद पर रखा जाता है, लेकिन यहां उन्हें अतिरिक्त जिम्मेदारियों से भी नवाजा गया। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि विभाग के भीतर उनका प्रभाव सामान्य अधिकारी से कहीं अधिक था।
अब जब ईडी और एसवीयू की जांच में टेंडर आवंटन, सरकारी परियोजनाओं में कथित अनियमितता और अवैध लेन-देन के आरोप सामने आ रहे हैं, तो यह सवाल और गंभीर हो गया है कि क्या विभाग के भीतर कोई ऐसा नेटवर्क काम कर रहा था जो चुनिंदा अधिकारियों को बचाने और उन्हें लाभ पहुंचाने में जुटा था?
इस बीच फुलवारीशरीफ स्थित तारणी दास के ठिकानों पर हुई छापेमारी के दौरान करोड़ों रुपये कैश मिलने इसके बाद उस दिन आनन -फानन में शाम में वक्त इनकी संविदा नियोजन को रद्द कर दिया गया।इसके बाद इतनी बड़ी मात्रा में कैश मिलने के बाद यह सवाल उठने लगे कि यह केवल एक अधिकारी की व्यक्तिगत कमाई का मामला नहीं माना जाएगा, बल्कि इसके पीछे पूरे सिस्टम की भूमिका की जांच जरूरी हो जाएगी।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में अब खुलकर यह चर्चा हो रही है कि तारिणी दास अकेले इतने बड़े फैसले नहीं करा सकते थे। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर वह कौन लोग थे जिन्होंने उनकी संविदा नियुक्ति का रास्ता साफ किया, अतिरिक्त प्रभार दिलाया और विभाग में उनका प्रभाव कायम रखा। क्या जांच एजेंसियां उन अधिकारियों और निर्णयकर्ताओं तक पहुंचेंगी जिन्होंने इन फाइलों को मंजूरी दी थी?
इधर रिशु श्री केस में पहले से ही आईएएस अधिकारी संजीव हंस का नाम चर्चा में रहा है। अब जब एसवीयू ने कार्रवाई तेज कर दी है और आज रिशु श्री से जुड़े मामले में एसवीयू कांड संख्या 05/25 के तहत कार्रवाई करते हुए मुमुक्षु चौधरी, तारिणी दास और उमेश कुमार सिंह को हिरासत में लेकर पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया है । वहीं मामले के एक अन्य प्रमुख आरोपित आईएएस अधिकारी संजीव हंस का पता नहीं चल सका। सूत्रों के अनुसार वे फिलहाल राज्य से बाहर बताए जा रहे हैं।
फिलहाल जांच एजेंसियां कुछ भी कहने से बच रही हैं, लेकिन एक बात साफ है कि तारिणी दास की गिरफ्तारी ने कई पुरानी फाइलों और फैसलों को फिर से चर्चा में ला दिया है। अब बिहार की जनता यह जानना चाहती है कि क्या जांच केवल मोहरों तक पहुंचेगी या फिर उन खिलाड़ियों तक भी, जिन्होंने पूरे खेल की पटकथा लिखी थी।