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08-Jan-2026 09:54 AM
By First Bihar
Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को आवारा कुत्तों (Stray Dogs) से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प और चर्चा में आने वाला दृश्य देखने को मिला। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के सामने पशु प्रेमी, विशेषज्ञ और पीड़ित पक्ष अपनी बात रख रहे थे, तभी एक महिला ने अनजाने में कोर्ट के कड़े प्रोटोकॉल को तोड़ दिया।
सुनवाई के दौरान महिला ने जजों का धन्यवाद करते हुए अपनी बात शुरू की और उन्हें सीधे “You Guys” कहकर संबोधित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के प्रोटोकॉल के अनुसार जजों को संबोधित करने के लिए विशेष शब्दावली का प्रयोग करना अनिवार्य होता है, जैसे ‘मिलॉर्ड’, ‘योर लॉर्डशिप’ या ‘योर ऑनर’। महिला के इस साधारण लेकिन अनौपचारिक संबोधन ने कोर्ट रूम में मौजूद वकीलों और अन्य लोगों को हैरान कर दिया।
महिला के इस अनपेक्षित शब्द चयन पर कोर्ट में मौजूद कुछ वकीलों ने धीरे-धीरे उन्हें टोका और समझाया कि कोर्ट में बोलते समय इस तरह का संबोधन नहीं किया जाता। महिला ने तुरंत अपनी गलती स्वीकार की और माफी मांगी। उन्होंने कहा कि उन्हें कोर्ट के नियमों की पूरी जानकारी नहीं थी और उनका उद्देश्य केवल जजों के प्रति आभार प्रकट करना था।
हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ ने इस स्थिति को बेहद सहजता से संभाला। उन्होंने महिला को सांत्वना देते हुए कहा, “कोई बात नहीं, यह ठीक है।” इसके साथ ही जज ने बिना किसी औपचारिकता या अनावश्यक ध्यान भटकाए सुनवाई को आगे बढ़ाया। उनके इस व्यवहार ने कोर्ट के प्रोटोकॉल और मानवीय दृष्टिकोण के बीच संतुलन की मिसाल पेश की।
विशेषज्ञों और वरिष्ठ वकीलों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में अक्सर शब्दों और प्रोटोकॉल को लेकर बहुत सख्ती देखने को मिलती है। किसी भी गलती या नियम तोड़ने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की संभावना होती है। ऐसे में जस्टिस विक्रम नाथ का यह मानवीय और सहज रवैया अनोखा माना जा रहा है। उन्होंने साबित किया कि न्याय प्रक्रिया में केवल तकनीकी शब्दावली या औपचारिकता नहीं, बल्कि आम आदमी की बात को ध्यान से सुनना और समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
इस घटना ने सोशल मीडिया और कानूनी समुदाय में भी चर्चा पैदा कर दी है। कई कानूनी विशेषज्ञों ने जस्टिस के व्यवहार की सराहना की और इसे न्यायपालिका की संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का उदाहरण बताया। उनके अनुसार, न्याय केवल कानून की किताबों तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें जनता और उनके मुद्दों को समझने की क्षमता भी शामिल होती है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई आवारा कुत्तों की सुरक्षा और उनके खिलाफ हिंसा को रोकने से संबंधित थी। पीठ ने इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षों से तर्क सुने और सुझाव मांगे कि किस तरह से आवारा कुत्तों के संरक्षण और जनता की सुरक्षा दोनों को संतुलित किया जा सकता है। इस दौरान महिला की बात ने यह साबित किया कि आम लोग भी न्यायपालिका की प्रक्रिया में अपनी राय रख सकते हैं और उनके विचार महत्वपूर्ण हैं।
जज विक्रम नाथ का व्यवहार यह दिखाता है कि न्याय की प्रक्रिया में संवेदनशीलता और सहानुभूति का होना भी जरूरी है। कोर्ट में औपचारिकता और नियमों के पालन के साथ-साथ यह समझना भी आवश्यक है कि सामने वाला व्यक्ति किसी कारणवश नियमों का पालन न कर पाए, तो उसे सहजता और सम्मान के साथ मार्गदर्शन दिया जाए।
इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर भी सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली। कई लोग जस्टिस के इस व्यवहार को उदाहरण मानते हुए कह रहे हैं कि न्यायपालिका में मानवीय दृष्टिकोण और आम आदमी की समझ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वहीं, कानूनी विशेषज्ञ इसे एक सीख बताते हुए कहते हैं कि अदालत में औपचारिकता बनाए रखना जरूरी है, लेकिन उसमें कठोरता की बजाय सहजता और संवेदनशीलता भी आवश्यक है।
इस तरह की घटनाएं न्यायपालिका की छवि को न केवल संवेदनशील बनाती हैं, बल्कि आम जनता और अदालत के बीच एक विश्वास और संवाद स्थापित करने में मदद करती हैं। महिला के अनजाने में किए गए “You Guys” संबोधन और जस्टिस के सहज व्यवहार ने यह साबित किया कि न्याय केवल कानून की तकनीकी बारीकियों तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें मानवीय संवेदनाएं भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
सुप्रीम कोर्ट में यह घटना न्याय और मानवीयता के बीच संतुलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गई है। जज विक्रम नाथ ने यह दिखा दिया कि कोर्ट की गरिमा को बनाए रखते हुए भी आम आदमी की बात को प्राथमिकता दी जा सकती है और सुनवाई को सहज और सम्मानजनक तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है।