Chief Minister Bihar : बिहार की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक मोड़ दर्ज हुआ है—करीब 75 साल का लंबा इंतज़ार आखिरकार खत्म हो गया। अटल बिहारी वाजपेई का वह सपना, जो भारतीय जनसंघ के दौर से देखा जा रहा था, आज साकार होता नजर आया। पहली बार भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता बिहार की मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा है, और यह मुकाम हासिल किया है सम्राट चौधरी ने।


मुख्य सचिवालय में उनके नाम की प्लेट लगते ही सिर्फ एक चेहरा नहीं बदला, बल्कि सत्ता का पूरा नैरेटिव बदल गया। यह बदलाव सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि दशकों से चल रहे सियासी समीकरणों की नई परिभाषा भी है। लंबे समय तक नीतीश कुमार के नेतृत्व में चली राजनीति के बाद अब एक नया अध्याय शुरू हो चुका है—जहां बीजेपी न सिर्फ साझेदार है, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर भी काबिज है।


इस पल तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। भारतीय जनसंघ से लेकर बीजेपी तक, पार्टी ने बिहार में कई बार सत्ता के करीब पहुंचकर भी मुख्यमंत्री पद हासिल नहीं किया। कभी गठबंधन की मजबूरियां, तो कभी राजनीतिक परिस्थितियां आड़े आईं। लेकिन आज, 75 साल की राजनीतिक तपस्या का फल पार्टी को मिल गया।


अगर सम्राट चौधरी के राजनीतिक सफर पर नजर डालें, तो यह भी उतना ही दिलचस्प है जितना उनका मुख्यमंत्री बनना। 1999 में उन्होंने पहली बार बिहार सरकार में मंत्री पद संभाला था। उस समय राज्य में राबड़ी देवी की सरकार थी और उन्हें कृषि मंत्री बनाया गया था। यही वह दौर था जब उम्र विवाद को लेकर उनका नाम सुर्खियों में भी आया।


सम्राट चौधरी का राजनीतिक डीएनए भी मजबूत रहा है। वे वरिष्ठ नेता शकुनी चौधरी के बेटे हैं, और उन्हें राजनीति में शुरुआती बड़ा मौका मिला लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में। लालू यादव ने उन्हें एक युवा और ओबीसी चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया, जिससे उनकी पहचान तेजी से बनी।


जातीय समीकरणों की बात करें तो सम्राट चौधरी कोइरी (OBC) समुदाय से आते हैं—जो बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण सामाजिक आधार माना जाता है। इस समुदाय से मुख्यमंत्री बनने वाले वे दूसरे नेता हैं। इससे पहले 1968 में सतीश प्रसाद सिंह ने यह मुकाम हासिल किया था, लेकिन उनका कार्यकाल महज पांच दिनों तक ही सीमित रह गया था। कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने के चलते उनकी सरकार गिर गई थी, और यह अध्याय अधूरा ही रह गया।


यही वजह है कि सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक अधूरी कहानी का पूरा होना भी है। जहां कभी कोइरी समुदाय का नेतृत्व कुछ ही दिनों में खत्म हो गया था, वहीं अब उसी समुदाय का एक नेता पूरे अधिकार और स्थिरता के साथ सत्ता की कमान संभाल रहा है।


अब सवाल यह है कि यह बदलाव बिहार की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगा। क्या बीजेपी अपने इस ऐतिहासिक मौके को स्थायी जनाधार में बदल पाएगी? क्या गठबंधन की राजनीति में यह संतुलन लंबे समय तक बना रहेगा? इन सवालों के जवाब आने वाला समय देगा। फिलहाल इतना तय है कि बिहार की राजनीति में एक नया युग शुरू हो चुका है—जहां 75 साल का इंतजार इतिहास बन गया है, और भविष्य की नई पटकथा लिखी जा रही है।