बिहार की सियासत में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के भीतर एक बार फिर संगठन को लेकर हलचल तेज हो गई है। पार्टी के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव पद से इस्तीफा दे चुके अब्दुल बारी सिद्दीकी के एक नए निर्देश ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा बढ़ा दी है। सिद्दीकी ने प्रदेश की उन जिला और प्रखंड कमेटियों को दिल्ली पहुंचने का फरमान जारी किया है, जिन्हें करीब तीन महीने पहले ही भंग कर दिया गया था। दिलचस्प बात यह है कि इन कमेटियों को भंग करने के बाद अब तक नई कमेटियों का गठन नहीं हो सका है। ऐसे में राजद के संगठनात्मक ढांचे और पार्टी के भीतर चल रही गतिविधियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
दरअसल, राजद में बीते कुछ समय से संगठन को नए सिरे से तैयार करने की कवायद चल रही है। इसी क्रम में 6 अगस्त को प्रदेश की सभी संगठनात्मक कमेटियों को भंग कर दिया गया था। इसके बाद उम्मीद थी कि पार्टी जल्द ही नई कमेटियों का गठन कर संगठन को नई दिशा देगी। लेकिन ढाई महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी नई कमेटियों की तस्वीर साफ नहीं हो सकी है। अब पुरानी कमेटियों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को दिल्ली बुलाने के निर्देश ने इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना दिया है।
अब्दुल बारी सिद्दीकी ने प्रदेश की जिला और प्रखंड कमेटियों को पत्र भेजकर दिल्ली पहुंचने का निर्देश दिया है। बताया जा रहा है कि यह कवायद आगामी राजनीतिक कार्यक्रम की तैयारियों से जुड़ी है। 1 नवंबर को नई दिल्ली में विपक्षी दलों के गठबंधन 'इंडिया' की ओर से 'वोट बचाओ, देश बचाओ' महारैली प्रस्तावित है। इस कार्यक्रम में राजद की भागीदारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी यादव भी दिल्ली पहुंच चुके हैं।
महारैली को सफल बनाने के लिए राजद ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को जुटाने की तैयारी तेज कर दी है। इसी सिलसिले में सांसदों, विधायकों, विधान पार्षदों और संगठन के विभिन्न स्तरों पर जुड़े नेताओं के साथ जिला और प्रखंड स्तर के कार्यकर्ताओं को भी दिल्ली पहुंचने का निर्देश दिया गया है। पार्टी चाहती है कि बिहार से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता इस रैली में शामिल हों, ताकि विपक्षी एकजुटता का संदेश मजबूती से दिया जा सके।
हालांकि, इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा अब्दुल बारी सिद्दीकी के इस्तीफे को लेकर हो रही है। राष्ट्रीय प्रधान महासचिव के पद से इस्तीफा देने के बावजूद उनके पास संगठन से जुड़ी जिम्मेदारियां बने रहने की बात सामने आई है। बताया जा रहा है कि लालू प्रसाद यादव ने अभी तक उनके इस्तीफे को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है। उन्हें मौखिक तौर पर कामकाज संभालते रहने को कहा गया है। यही वजह है कि संगठनात्मक निर्देश जारी होने के बाद पार्टी के भीतर उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
राजद नेताओं की ओर से इस संबंध में तर्क दिया जा रहा है कि सिद्दीकी ने तेजस्वी यादव के निर्देशों के अनुरूप पुरानी कमेटियों को ध्यान में रखकर रैली की तैयारी का आदेश दिया है। ऐसे में भंग कमेटियों को दिल्ली बुलाने का मकसद संगठन के पुराने नेटवर्क का इस्तेमाल कर अधिक से अधिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित करना माना जा रहा है।
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राजद के लिए संगठन को मजबूत करना और कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना अहम चुनौती है। ऐसे में दिल्ली की महारैली को पार्टी अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के अवसर के तौर पर देख सकती है। एक ओर नई कमेटियों के गठन का इंतजार है, तो दूसरी ओर पुरानी कमेटियों के पदाधिकारियों को ही बड़ी जिम्मेदारी दी जा रही है।
अब सवाल यह है कि क्या दिल्ली की महारैली के बाद राजद अपने संगठनात्मक ढांचे को लेकर कोई बड़ा फैसला करेगा? क्या अब्दुल बारी सिद्दीकी के इस्तीफे पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा, या फिर वह पहले की तरह संगठन की जिम्मेदारियां संभालते रहेंगे? फिलहाल इन सवालों के जवाब का इंतजार है। लेकिन इतना साफ है कि राजद में संगठनात्मक बदलाव और दिल्ली की महारैली की तैयारियों ने बिहार की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।