नई दिल्ली: शिक्षा व्यवस्था को लेकर देशभर में बढ़ते विवाद और छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बीच केंद्र सरकार ने ऐसा फैसला लिया जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पीछे की कहानी अब धीरे-धीरे सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, शुरुआत में सरकार का रुख बेहद सख्त था और माना जा रहा था कि शिक्षा मंत्रालय तथा राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) में की गई कार्रवाई ही हालात संभालने के लिए पर्याप्त होगी। लेकिन अगले 24 घंटे में घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि आखिरकार शिक्षा मंत्री को पद छोड़ना पड़ा।
शुरुआत में सरकार ने दिखाई सख्ती
जानकारी के अनुसार, शुक्रवार सुबह तक सरकार का मानना था कि मंत्रालय में की गई प्रशासनिक कार्रवाई से विवाद शांत हो जाएगा। इसी क्रम में उच्च शिक्षा सचिव को पद से हटाया गया, जबकि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) से जुड़े 47 अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी बड़ी कार्रवाई की गई। सरकार को उम्मीद थी कि इन फैसलों से छात्रों और विपक्ष का गुस्सा कम होगा। हालांकि, हालात इसके उलट होते चले गए। देश के कई हिस्सों में छात्रों का प्रदर्शन तेज हो गया और विपक्ष ने भी सरकार पर लगातार हमले शुरू कर दिए। इसी बीच प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंचे कुछ अहम इनपुट ने पूरे मामले की दिशा बदल दी।
PMO तक पहुंची रिपोर्ट, प्रधानमंत्री ने खुद संभाली कमान
सूत्रों का दावा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को मिली रिपोर्ट में बताया गया कि केवल प्रशासनिक कार्रवाई से मामला शांत होने वाला नहीं है। विरोध प्रदर्शन लगातार बढ़ रहा है और इसका राजनीतिक असर भी व्यापक हो सकता है। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद पूरे घटनाक्रम की निगरानी शुरू की। वरिष्ठ नेताओं और अधिकारियों के साथ कई दौर की चर्चा हुई। माना जा रहा है कि इसी मंथन के बाद यह निष्कर्ष निकला कि सरकार को बड़ा राजनीतिक संदेश देने की जरूरत है।
24 घंटे में बदल गया पूरा घटनाक्रम
शुक्रवार तक जहां सरकार किसी बड़े राजनीतिक फैसले के पक्ष में नहीं दिख रही थी, वहीं अगले 24 घंटे में स्थिति पूरी तरह बदल गई। शनिवार तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सामने आ गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार ने इससे यह संदेश देने की कोशिश की कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर वह जवाबदेही तय करने के लिए तैयार है।
अमित शाह भी लगातार रखते रहे नजर
सूत्रों के अनुसार, पूरे घटनाक्रम पर गृह मंत्री अमित शाह भी लगातार नजर बनाए हुए थे। सरकार के शीर्ष स्तर पर लगातार बैठकों का दौर चलता रहा और हर पहलू पर चर्चा की गई। सुरक्षा व्यवस्था, छात्र आंदोलन और विपक्ष की रणनीति को भी ध्यान में रखा गया।
विपक्ष ने जारी रखा हमला
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद भी विपक्ष ने सरकार को घेरना बंद नहीं किया। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का कहना है कि केवल इस्तीफा देना पर्याप्त नहीं है। उनका आरोप है कि परीक्षा व्यवस्था में आई गड़बड़ियों की पूरी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और मामले की व्यापक जांच होनी चाहिए। विपक्षी नेताओं ने सरकार से यह भी पूछा कि यदि व्यवस्था में इतनी बड़ी खामियां थीं तो उन्हें पहले क्यों नहीं सुधारा गया।
छात्रों के आंदोलन ने बढ़ाया दबाव
देशभर के कई विश्वविद्यालयों और छात्र संगठनों ने हाल के दिनों में लगातार प्रदर्शन किए। छात्रों का कहना था कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए हैं और सरकार को केवल अधिकारियों पर कार्रवाई करने के बजाय जवाबदेही तय करनी चाहिए। इसी बढ़ते दबाव ने सरकार के सामने चुनौती खड़ी कर दी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि छात्रों के आंदोलन और विपक्ष के हमलों ने मिलकर सरकार पर बड़ा दबाव बनाया।
आगे क्या?
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब नए शिक्षा मंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती परीक्षा प्रणाली में भरोसा बहाल करने की होगी। माना जा रहा है कि सरकार आने वाले दिनों में NTA और परीक्षा प्रणाली में कई बड़े सुधारों की घोषणा कर सकती है ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।
फिलहाल, पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि जब किसी मुद्दे का असर राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने लगता है, तो सरकार को राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बड़े फैसले लेने पड़ते हैं। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी ऐसे ही एक फैसले के रूप में देखा जा रहा है, जिसने देश की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था दोनों को नई बहस के केंद्र में ला दिया है।