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16-Jan-2026 03:06 PM
By FIRST BIHAR
NEET student death : बिहार की राजधानी पटना के राजेंद्रनगर इलाके के मुन्नाचौक स्थित शुंभु होस्टल में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की मौत ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। मामला तब और गंभीर हो गया जब सरकारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आई, जिसमें छात्रा के शरीर पर दस से अधिक चोटों के निशान पाए गए। इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि छात्रा के साथ केवल दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं हुई, बल्कि उसके साथ अमानवीय कृत्य किया गया हो सकता है। बावजूद इसके, पटना पुलिस की कार्यशैली और कप्तान के लगातार बदलते बयान इस पूरे मामले को और अधिक संदेहास्पद और चिंताजनक बना रहे हैं।
शुरुआती दिनों में पटना पुलिस के कप्तान ने बार-बार यह दावा किया कि छात्रा की मौत का कारण नशे की गोली का सेवन है और उसके साथ किसी भी प्रकार का गलत बर्ताव नहीं हुआ। यही नहीं, उन्होंने पीड़िता के परिवार की शिकायतों और आरोपों को नजरअंदाज किया। छात्रा के पिता लगातार यह कहते रहे कि उनकी बेटी के साथ जबरदस्ती और अमानवीय व्यवहार हुआ, लेकिन पुलिस कप्तान ने इसे लेकर कोई गंभीर टिप्पणी करने से इनकार किया और निजी अस्पताल के डॉक्टर की रिपोर्ट के आधार पर मामला "साधारण मौत" की श्रेणी में डाल दिया।
लेकिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आई, तो स्थिति पूरी तरह बदल गई। रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर उल्लेख था कि छात्रा के शरीर पर कई तरह के चोट के निशान हैं, जो सिर्फ नशे की अधिक खुराक से हुई मौत से मेल नहीं खाते। इस रिपोर्ट के बाद पुलिस ने होस्टल के वार्डनर को गिरफ्तार किया और मामले की जांच शुरू की। यह अचानक कदम पुलिस की पहले की रवैये और कप्तान के शुरुआती बयान के साथ पूरी तरह विरोधाभासी लगता है।
पटना पुलिस के कप्तान ने अब आज यह बयान दिया है कि जो अभी पोस्टमार्टम रिपोर्ट आया है उसी के तहत हम लोग आगे की कार्यवाही कर रहे हैं। इसी मामले में हॉस्टल के जो वार्डनर है उनकी गिरफ्तारी हुई है। इसमें आगे अनुसंधान का दायरा बढ़ा है क्योंकि पहले जो रिपोर्ट आया था उसमें प्राइवेट गायनी डॉक्टर के तरफ से और इलाज से संबंधित जो भी कागजात मिले थे उसमें और पोस्टमार्टम में अलग-अलग बातें लिखी गई है। इसलिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट को हायर सेंटर पटना एम्स रेफर किया गया है। अभी फिलहाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सही मानते हुए अनुसंधान कर रहे हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चुकी यह बातें कही गई है यौन हिंसा से इनकार नहीं किया जा सकता है तो इसको सत्य मानते हुए आगे की जांच प्रक्रिया में लगे हुए हैं।
अब सवाल उठता है कि आखिर पटना पुलिस के कप्तान ने बिना गहन जांच के और बिना सरकारी डॉक्टर के अंतिम बयान का इंतजार किए हुए इतनी जल्दी बयान जारी क्यों किया? क्या किसी दबाव में वह निजी अस्पताल के डॉक्टर के कथन को सच्चाई मान बैठे? यह बात पुलिस की निष्पक्षता पर गहरा सवाल खड़ा करती है। आमतौर पर ऐसे गंभीर मामलों में पुलिस महकमा अंतिम निर्णय लेने से पहले सरकारी पोस्टमार्टम और डॉक्टर की रिपोर्ट का इंतजार करता है, ताकि कोई गड़बड़ी या जल्दीबाजी न हो। इसका ताजा उदाहरण अनंत सिंह और दुलारचंद यादव हत्याकांड में देखा जा सकता है, जहां पुलिस ने अंतिम समय तक सरकारी डॉक्टर की रिपोर्ट का इंतजार किया और फिर उसके आधार पर ही कार्रवाई की।
लेकिन, इस मामले में पुलिस की कार्यशैली संदेहास्पद और अव्यवस्थित दिख रही है। महज 48 घंटे के भीतर दो अलग-अलग बयान देना यह दर्शाता है कि पुलिस के अंदर सही दिशा का अभाव है और वह किसी बाहरी दबाव में काम कर रही है। ऐसी बातें राजधानी में हर एक शक्श की जुबान पर है। लोगों का कहना है कि पहले पुलिस के लोग कहते हैं कि "छात्रा के साथ कोई गलत कृत्य नहीं हुआ," और फिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद उसी बयान को पलट देते हैं। इस प्रकार की बयानबाजी न केवल पुलिस की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाती है, बल्कि आम जनता के मन में भी न्याय के प्रति विश्वास को हिला देती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि छात्रा को शुरूआती इलाज के लिए जिस निजी अस्पताल में लाया गया, वहां डॉक्टर ने कहा कि मौत नशे की गोली के अधिक सेवन की वजह से हुई। लेकिन सरकारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से अन्य बातें सामने आई हैं। यह दर्शाता है कि पुलिस ने पारदर्शिता और नियमों का पालन किए बिना मामले पर पूर्वाग्रह के साथ निर्णय ले लिया। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर पटना पुलिस ने इतनी जल्दबाजी क्यों की? क्या यह सामाजिक दबाव, राजनीतिक प्रभाव या निजी हितों की वजह से था?
मामले की गंभीरता यह भी है कि छात्रा की मौत केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह पूरी प्रणाली की विफलता को उजागर करती है। जब पुलिस अपनी कार्यशैली में गड़बड़ी करती है, बयान बदलती है और बिना जांच के निष्कर्ष निकालती है, तो यह सीधे तौर पर न्याय प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है। सरकार और उच्च पुलिस अधिकारियों को इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच निष्पक्ष और गहन हो।
जब इस मामले में हमने जहानाबाद के लोगों से और कुछ अलग -अलग छात्रों से संपर्क किया तो उनका कहना था कि अभी जो भी कार्रवाई हो रही है, वह प्रारंभिक कदम मात्र है। केवल वार्डन की गिरफ्तारी से मामले का निष्पक्ष समाधान नहीं निकलेगा। सभी संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच की जानी चाहिए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार जो तथ्य सामने आए हैं, उन्हें गंभीरता से देखा जाना चाहिए और पुलिस को अपनी कार्यशैली में सुधार करना होगा। इस मामले ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर पुलिस प्रोटोकॉल का पालन नहीं करती और बिना प्रमाण के बयान देती है, तो यह सीधे तौर पर न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को खतरे में डाल देता है।
पटना पुलिस के कप्तान को अब यह समझना होगा कि जनता केवल कार्रवाई की प्रतीक्षा नहीं कर रही है, बल्कि निष्पक्ष, पारदर्शी और जिम्मेदार पुलिसिंग की उम्मीद कर रही है। यह मामला सिर्फ एक छात्रा की मौत का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही और कार्यशैली पर सवाल खड़ा करने वाला मामला है। यदि भविष्य में ऐसे मामलों में भी जल्दीबाजी और आधे-अधूरे निष्कर्ष जारी किए जाते रहे, तो न्याय की उम्मीद और लोगों का विश्वास लगातार कमजोर होगा।
इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि पटना पुलिस को अपने भीतर अनुशासन और पारदर्शिता की जरूरत है। बिना पूरी जांच किए और दबाव में बयान बदलना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। न्याय केवल मृतक छात्रा के परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए भी आवश्यक है। इस मामले में हर कदम पर निगरानी, जवाबदेही और निष्पक्षता की सख्त आवश्यकता है।