पटना : सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन देने के मुद्दे पर पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) लागू नहीं होती, तब तक मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत की गई दूसरी शादी को वैध माना जाएगा। ऐसे में यदि सरकारी कर्मचारी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार दूसरी शादी की है, तो उसकी दूसरी पत्नी भी पारिवारिक पेंशन की हकदार हो सकती है। यह फैसला न केवल पेंशन से जुड़े विवादों पर असर डाल सकता है, बल्कि भविष्य में मुस्लिम पर्सनल लॉ और सरकारी सेवा नियमों से जुड़े कई मामलों में भी मिसाल माना जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
मामला एक मुस्लिम सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन दिए जाने से जुड़ा था। संबंधित विभाग ने दूसरी पत्नी के दावे को स्वीकार नहीं किया, जिसके बाद मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा। याचिका में कहा गया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत दूसरी शादी वैध है, इसलिए दूसरी पत्नी को पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों के साथ-साथ सरकारी नियमों का भी परीक्षण किया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब तक देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) या ऐसा कोई कानून जो मुस्लिमों में बहुविवाह पर रोक नहीं लगाता हैं, तब तक मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुई दूसरी शादी मान्य होगी। इसके आधार पर किसी मुस्लिम विधवा को पारिवारिक पेंशन देने से राज्य सरकार इनकार नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की एकलपीठ ने मृत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी नजमा खातून की ओर से दायर अर्जी पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया। आवेदिका के अधिवक्ता ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग में रहे मो. उस्मान ने अपने जीवन काल में ही अपने पीपीओ (पेंशन अधिसूचना पत्र) में सुधार के लिए एक आवेदन दिया था।
आवेदन में अपनी मृत पहली पत्नी और उसके पुत्र का नाम हटाकर दूसरी पत्नी व उससे उत्पन्न पुत्री का नाम पीपीओ में दर्ज करने का आग्रह किया था। पति की मौत के बाद नजमा खातून ने पारिवारिक पेंशन देने की गुहार स्वास्थ्य विभाग से की। विभाग ने पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी के अवैध होने का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया। इसके बाद आवेदिका ने हाईकोर्ट में अर्जी दायर कर सरकार के आदेश को चुनौती दी।
पटना हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब तक विधायिका द्वारा इसमें बदलाव नहीं किया जाता, तब तक मुस्लिमों के वैवाहिक अधिकार और दायित्व मुस्लिम पर्सनल लॉ से ही गाइड होंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मुस्लिम पुरुष की शादी की वैधता की जांच उसी पर्सनल लॉ के तहत होगी, जो उस पर लागू होता है। बशर्ते सरकारी सेवा शर्तों में इसके लिए कोई स्पष्ट वैधानिक रोक न हो। हाईकोर्ट ने विभाग को निर्देश दिया कि नजमा खातून को नियमानुसार पारिवारिक पेंशन का लाभ देने के लिए कार्रवाई करें।
UCC का क्यों हुआ जिक्र?
फैसले में अदालत ने समान नागरिक संहिता (UCC) का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि जब तक पूरे देश में UCC लागू नहीं होता, तब तक अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानून लागू रहेंगे। मुस्लिम समुदाय के मामलों में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषय मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार ही तय किए जाएंगे। यही कारण है कि अदालत ने दूसरी शादी को वैध मानते हुए दूसरी पत्नी के अधिकारों को भी स्वीकार किया।
फैसले का क्या होगा असर?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है, जहां मुस्लिम सरकारी कर्मचारियों की दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन या अन्य सेवा संबंधी लाभ देने को लेकर विवाद पैदा होता है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हर मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय होगा। यदि दूसरी शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार वैध रूप से हुई है, तभी इस फैसले का लाभ मिल सकेगा।
क्यों है यह फैसला अहम?
यह निर्णय इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हाल के वर्षों में समान नागरिक संहिता को लेकर देशभर में बहस तेज हुई है। ऐसे समय में पटना हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि जब तक UCC लागू नहीं होता, तब तक व्यक्तिगत कानूनों का पालन किया जाएगा। इस फैसले से मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत दूसरी शादी करने वाली महिलाओं के अधिकारों को लेकर भी एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश गया है। साथ ही सरकारी विभागों के लिए भी यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के निपटारे में मार्गदर्शक साबित हो सकता है।