Bihar News : पटना में बिजली बिल का बकाया होना एक उपभोक्ता के लिए बड़ी परेशानी बन गया। लेकिन जब बकाया बिल के बाद बिजली चोरी का मुकदमा दर्ज हुआ तो मामला पटना हाईकोर्ट तक पहुंच गया। अदालत ने इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया कि सिर्फ बिजली बिल का भुगतान नहीं करना अपने आप में बिजली चोरी साबित नहीं करता। हाईकोर्ट ने बिजली चोरी से जुड़ी एफआईआर को रद्द कर दिया।


मामला करीब 5.39 लाख रुपये के बिजली बिल बकाये से जुड़ा था। बिजली विभाग की ओर से बकाया राशि का भुगतान नहीं होने पर उपभोक्ता का कनेक्शन काट दिया गया था। इसके बाद विभाग की कार्रवाई आगे बढ़ी और बिजली चोरी का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई गई। उपभोक्ता ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


बिल बकाया और बिजली चोरी में अंतर

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले के अहम पहलू पर गौर किया। अदालत ने माना कि बिजली का बिल बकाया होना और जानबूझकर बिजली चोरी करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। महज इस आधार पर कि उपभोक्ता पर बड़ी रकम का बिजली बिल बाकी है, उसे बिजली चोरी का आरोपी नहीं बनाया जा सकता।


अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिजली बिल का विवाद होने पर विभाग के पास बकाया राशि की वसूली के लिए सिविल कार्रवाई का रास्ता मौजूद है। लेकिन केवल भुगतान नहीं करने के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं होगा, जब तक बिजली चोरी के लिए जरूरी तत्व सामने न आएं।


'बेईमानी की मंशा' पर अदालत की नजर

बिजली चोरी के मामले में सिर्फ मीटर या बिल से जुड़ा विवाद पर्याप्त नहीं है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आपराधिक कार्रवाई के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या उपभोक्ता की ओर से बिजली का अवैध इस्तेमाल करने या विभाग को धोखा देने की बेईमानी की मंशा थी।


यानी किसी उपभोक्ता के ऊपर लाखों रुपये का बिजली बिल बाकी है तो इसका सीधा मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि उसने बिजली चोरी की है। बिल का भुगतान न करना एक अलग विवाद हो सकता है, जबकि बिजली चोरी के लिए अलग कानूनी आधार और साक्ष्य जरूरी हैं।


कनेक्शन कटने के बाद भी बढ़ गया विवाद

इस मामले में बिजली विभाग ने पहले बकाया राशि के कारण कनेक्शन काटा। इसके बाद बिजली चोरी की प्राथमिकी दर्ज होने से मामला और गंभीर हो गया। उपभोक्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि बकाया बिल को बिजली चोरी का आधार नहीं बनाया जा सकता।


हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए प्राथमिकी रद्द कर दी। अदालत के इस फैसले से यह संदेश साफ है कि बिजली बिल का बकाया और बिजली चोरी का अपराध एक ही चीज नहीं है।


उपभोक्ताओं के लिए क्या मायने?

फैसले का सीधा मतलब यह नहीं है कि बिजली बिल जमा नहीं करने पर विभाग कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। बकाया राशि की वसूली के लिए बिजली विभाग अपने वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन किसी उपभोक्ता पर बिजली चोरी का आपराधिक आरोप लगाने के लिए केवल बकाया बिल पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।


पटना हाईकोर्ट का यह फैसला ऐसे उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है जिनके बिजली बिल को लेकर विवाद चल रहा है। अदालत ने साफ कर दिया कि बकाया बिल की वसूली और बिजली चोरी की आपराधिक कार्रवाई के बीच कानूनी अंतर बनाए रखना जरूरी है।