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06-Mar-2026 09:34 AM
By First Bihar
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से चल रही अटकलों पर अब विराम लग गया है। करीब दो दशकों तक राज्य की सत्ता की कमान संभालने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सक्रिय सत्ता की राजनीति से एक बड़ा कदम पीछे लेते हुए राज्यसभा का रुख कर लिया है। उनके इस फैसले को बिहार की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि यह फैसला अचानक लगता है, लेकिन राजनीतिक गलियारों से मिल रही जानकारी बताती है कि इसकी पटकथा पिछले एक महीने से बेहद रणनीतिक तरीके से लिखी जा रही थी।
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को राजनीति में लाने की चर्चा तेज हुई। लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन और राजनीति से दूर रहने वाले निशांत हाल के दिनों में जेडीयू के कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से दिखाई देने लगे थे। पार्टी के भीतर एक बड़ा वर्ग मानता था कि नीतीश कुमार के गिरते स्वास्थ्य के बीच निशांत ही वह चेहरा हो सकते हैं जो पार्टी को एकजुट रखने का काम कर सकता है।
इसी दौरान एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम बिहार के सीमावर्ती जिले किशनगंज में सामने आया। यहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का विशेष विमान उतरा। दिन में उन्होंने एसएसबी, आईबी और अन्य खुफिया एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ सीमाई इलाकों की सुरक्षा और हालात की समीक्षा की। यह एक आधिकारिक बैठक थी, लेकिन इसके बाद देर रात एक बेहद अहम और गोपनीय राजनीतिक बैठक भी हुई।
यह बैठक बिहार सरकार के मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता दिलीप जायसवाल के आवास पर आयोजित की गई। इस बैठक में कोई अधिकारी मौजूद नहीं था, बल्कि केवल भाजपा के शीर्ष नेता शामिल थे। बैठक में मुख्य रूप से बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी, केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय और मंत्री दिलीप जायसवाल समेत कई प्रमुख नेता मौजूद थे।
बैठक में शामिल एक सूत्र ने बताया कि बंगाल चुनाव और सीमाई हालात की समीक्षा के बहाने आए गृह मंत्री ने अचानक बिहार भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ राजनीतिक चर्चा की। इस बैठक में बिहार की मौजूदा सरकार के कामकाज पर भी खुलकर बातचीत हुई। कई नेताओं ने यह भी कहा कि राज्य में “बिहार में खुद की सरकार बनाना होगा यदि कुछ अलग करना है, इसके बाद शाह ने वहीं प्लान की चर्चा शुरू कर दिया।
यहीं पर नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजने के विकल्प पर गंभीर चर्चा हुई। शुरुआत में योजना यह थी कि निशांत कुमार को राज्यसभा भेजकर उन्हें राष्ट्रीय राजनीति और संसदीय कामकाज की बारीकियां सिखाई जाएं। लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों, खासकर अमित शाह ने इसे एक बड़े राजनीतिक अवसर के रूप में देखा।
अमित शाह का मानना था कि नीतीश कुमार की सेहत एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है और उन्हें सम्मानजनक तरीके से सक्रिय सत्ता से विदाई देने का यह सही समय हो सकता है। इसी सोच के साथ भाजपा नेतृत्व ने इस योजना को आगे बढ़ाया।
अक्टूबर 2025 में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम भी इस रणनीति के पीछे एक अहम कारण बने। चुनाव में भाजपा को 89 और जेडीयू को 85 सीटें मिली थीं। भाजपा नेतृत्व को लगा कि यह वह समय है जब राजनीतिक समीकरण उनके पक्ष में हैं और वे नीतीश कुमार को पद छोड़ने के लिए राजी कर सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार भाजपा को यह भी आशंका थी कि अगर यह फैसला टाल दिया गया तो जेडीयू संगठन और सरकार दोनों स्तर पर खुद को फिर से मजबूत कर सकती है। इसके बाद मुख्यमंत्री पद खाली कराना आसान नहीं रहेगा। भाजपा दिसंबर 2026 तक इंतजार करने के पक्ष में नहीं थी, क्योंकि तब तक जेडीयू अपने कोटे के मंत्रियों की संख्या बढ़ाकर सरकार में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकती थी।
इस पूरे राजनीतिक ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए अमित शाह ने जेडीयू के तीन प्रमुख नेताओं—ललन सिंह, संजय झा और विजय कुमार चौधरी के साथ कई दौर की बैठकों की। अंततः विजय कुमार चौधरी को ही नीतीश कुमार के सामने यह प्रस्ताव रखने की जिम्मेदारी दी गई।
फरवरी के आखिरी सप्ताह से इन नेताओं की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ लगातार बैठकें शुरू हो गईं। भाजपा नेताओं ने उन्हें उनके पुराने राज्यसभा जाने के विचार की याद दिलाई और यह तर्क दिया कि यदि वे अभी यानी अप्रैल में राज्यसभा नहीं जाते हैं, तो अगला मौका दो साल बाद ही मिलेगा।
इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी नीतीश कुमार के परिवार को 3 मार्च को मिली, लेकिन तब तक राजनीतिक प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी थी। 4 मार्च को जेडीयू के वरिष्ठ मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने आखिरी प्रयास के तौर पर नीतीश कुमार से मुलाकात कर उनसे फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया। हालांकि तब तक राजनीतिक चक्रव्यूह तैयार हो चुका था और नीतीश कुमार ने राज्यसभा के नामांकन पत्रों पर हस्ताक्षर कर दिए।
समझौते के तहत अब निशांत कुमार दिल्ली की राजनीति के बजाय बिहार की राजनीति से अपनी पारी की शुरुआत करेंगे। इस तरह नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना न केवल उनके राजनीतिक करियर के एक नए अध्याय की शुरुआत है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक बड़े दौर के अंत का संकेत भी माना जा रहा है। लंबे समय तक ‘सुशासन बाबू’ के रूप में पहचाने जाने वाले नेता ने आखिरकार अपने स्वास्थ्य और बेटे के राजनीतिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री पद से दूरी बनाने का फैसला कर लिया है।