पटना : बिहार में 8 सीटों पर होने वाले विधान परिषद चुनाव की सरगर्मी अब सिर्फ चुनावी मैदान तक सीमित नहीं रह गई है। उम्मीदवारों और नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है। खासकर पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जेडीयू उम्मीदवार नीरज कुमार और जन सुराज प्रमुख व बांकीपुर विधायक प्रशांत किशोर के बीच जुबानी जंग लगातार तीखी होती जा रही है। प्रशांत किशोर के ‘पोल खोलने’ और जेडीयू नेताओं से जुड़े कागजात नीरज कुमार के जरिए मिलने के दावे पर अब नीरज कुमार ने खुलकर जवाब दिया है।
नीरज कुमार ने प्रशांत किशोर के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि चुनाव में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के बजाय नीतियों के आधार पर वोट मांगना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनसेवा करना उनका दायित्व है और वह इसी जिम्मेदारी के साथ चुनाव मैदान में हैं। नीरज कुमार ने कार्यकर्ताओं से भी अपील की कि 12 अक्टूबर तक वे खुद को नीरज कुमार मानकर चुनाव प्रचार में जुट जाएं। दरअसल, प्रशांत किशोर ने हाल में दावा किया था कि पिछले करीब डेढ़ साल में जेडीयू के कई नेताओं से जुड़ी जानकारियां और कागजात उन्हें मिले हैं। उनका इशारा नीरज कुमार की ओर था। पीके ने यहां तक कहा था कि अगर नीरज कुमार ने बयानबाजी जारी रखी तो वह उनके खिलाफ किए गए कथित कार्यों का कच्चा-चिट्ठा सार्वजनिक कर देंगे। इसी के बाद यह मामला चुनावी मुद्दे के साथ-साथ व्यक्तिगत राजनीतिक टकराव में बदलता नजर आया।
अब नीरज कुमार ने पीके के ‘कुंडली खोलने’ वाले बयान पर ऐसा जवाब दिया है, जिसमें उन्होंने अपनी निजी जिंदगी और संपत्ति से जुड़ी जानकारी तक सार्वजनिक कर दी। उन्होंने कहा कि उनकी कुंडली छिपी हुई नहीं है। उन्होंने कहा कि टाल में उनके हिस्से में 10 बीघा जमीन है और मोकामा स्थित घर में चार कमरे हैं। तीन भाई हैं और उनकी जिंदगी के बारे में जो जानना है, सार्वजनिक तौर पर जाना जा सकता है।
नीरज कुमार ने अपने जन्मदिन से जुड़ी एक व्यक्तिगत बात भी साझा की। उन्होंने कहा कि उनका जन्म 9 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन हुआ था और संयोग से उनके बेटे का जन्मदिन भी उसी दिन है। उन्होंने इसे अपने लिए सौभाग्य की बात बताते हुए कहा कि पिता और बेटे का जन्मदिन एक ही दिन होना उनके लिए गर्व और खुशी का विषय है।
जब नीरज कुमार से सीधे पूछा गया कि क्या वह जेडीयू नेताओं से जुड़े कागजात प्रशांत किशोर तक पहुंचाते थे, तो उन्होंने साफ शब्दों में इससे इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वह ऐसे काम नहीं करते। उनका कहना था कि चुनाव में मुद्दों और नीतियों के आधार पर मतदाताओं से समर्थन मांगना चाहिए।
नीरज कुमार ने चुनावी मुकाबले को लेकर भी आत्मविश्वास जताया। उन्होंने कहा कि उन्हें चुनाव में किसी तरह की चुनौती नजर नहीं आ रही है और समाज के सभी वर्गों का समर्थन उनके साथ है। यानी पीके के हमले के बीच नीरज कुमार ने अपने जवाब में रक्षात्मक होने के बजाय सीधे चुनावी जीत का दावा किया है।
कैसे शुरू हुई नीरज-पीके की जुबानी जंग?
नीरज कुमार और प्रशांत किशोर के बीच यह टकराव अचानक नहीं शुरू हुआ है। पिछले कुछ दिनों से दोनों नेता एक-दूसरे पर लगातार निशाना साध रहे हैं। नीरज कुमार ने पहले प्रशांत किशोर को भाषा की मर्यादा बनाए रखने की नसीहत दी थी। उन्होंने कहा था कि पीके को अपनी जुबान पर लगाम रखनी चाहिए और सरकार की नीतियों की आलोचना करनी है तो करें, लेकिन व्यक्तिगत आरोपों से बचना चाहिए।
नीरज कुमार ने यह भी दावा किया था कि जब उन्होंने पहले प्रशांत किशोर की कथित 14 कंपनियों से जुड़ी जानकारी सामने रखी थी, तब पीके के पास जवाब नहीं था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा था कि बांकीपुर की सीट जीत लेने भर से कोई खुद को ‘ग्लोबल थिंकर’ न समझे।
इसके जवाब में प्रशांत किशोर ने भी हमला तेज कर दिया। उन्होंने कहा कि नीरज कुमार अब महज कुछ दिनों के लिए विधान पार्षद हैं। पीके ने दावा किया कि पटना के शिक्षक और स्नातक मतदाताओं ने इस बार बदलाव का मन बना लिया है। उन्होंने नीरज कुमार के साथ भाजपा उम्मीदवार नवीन किशोर यादव को भी चुनाव में हराने का दावा किया।
पीके ने बांकीपुर विधानसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह भाजपा का वर्षों पुराना किला ढहा, उसी तरह विधान परिषद चुनाव में भी पटना में राजनीतिक बदलाव दिखाई देगा। उन्होंने एनडीए की बैठकों और चुनावी गतिविधियों को लेकर भी तंज कसा और दावा किया कि विपक्षी उम्मीदवारों को लेकर एनडीए में घबराहट है।
अब मुद्दा सिर्फ चुनाव नहीं, प्रतिष्ठा की लड़ाई भी
पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मुकाबला जैसे-जैसे मतदान की ओर बढ़ रहा है, नीरज कुमार और प्रशांत किशोर की बयानबाजी भी चुनावी माहौल को गरमा रही है। एक तरफ नीरज कुमार अपने लंबे राजनीतिक अनुभव और जेडीयू संगठन के समर्थन को अपनी ताकत बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ प्रशांत किशोर बदलाव और पुराने राजनीतिक चेहरों को हराने का नैरेटिव बना रहे हैं। अब देखना यह है कि 23 अक्टूबर को होने वाले मतदान में मतदाता व्यक्तिगत आरोपों और जुबानी जंग से कितना प्रभावित होते हैं और आखिरकार किसके पक्ष में अपना फैसला सुनाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि मतदान