पटना: बिहार विधान परिषद की पटना स्नातक सीट पर चुनावी सरगर्मी के बीच जेडीयू प्रत्याशी नीरज कुमार के सामने पुस्तकालय निर्माण को लेकर उठे सवालों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। एमएलसी फंड से पुस्तकालय निर्माण के नाम पर छह लाख रुपये के कथित घोटाले का आरोप लगने के बाद नीरज कुमार ने सफाई दी है। उन्होंने आरोपों को चुनौती देते हुए कहा कि पुस्तकालय बना हुआ है, जमीन का अनापत्ति प्रमाण पत्र भी प्राप्त है और वह किसी तरह का कमीशन नहीं लेते। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेने के साथ मौके पर जाकर निर्माण की स्थिति देखने की बात भी कही।
पटना स्नातक सीट पर चुनाव प्रचार के बीच यह विवाद नीरज कुमार के लिए नई चुनौती बन सकता है। एक तरफ वह अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त होने का दावा कर रहे हैं, दूसरी तरफ पुस्तकालय निर्माण में सरकारी राशि के इस्तेमाल को लेकर उठे सवालों ने उनके कामकाज और जनप्रतिनिधि के रूप में जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है।
छह लाख के कथित घोटाले का आरोप, चुनाव प्रचार में उठा मुद्दा
इस विवाद में राजद समर्थित नेता बंटू सिंह ने नीरज कुमार पर पुस्तकालय निर्माण के नाम पर एमएलसी फंड से छह लाख रुपये के कथित घोटाले का आरोप लगाया है। आरोप है कि जिस पुस्तकालय के निर्माण के लिए सरकारी राशि खर्च की गई, उसकी वास्तविक स्थिति और निर्माण कार्य पर सवाल हैं। विपक्ष की ओर से यह भी पूछा जा रहा है कि पुस्तकालय निर्माण के लिए जारी राशि का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप हुआ या नहीं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और सरकारी दस्तावेजों की जांच के बिना इसे साबित घोटाला नहीं कहा जा सकता। फिलहाल मामला चुनावी आरोप-प्रत्यारोप के बीच है और नीरज कुमार ने आरोपों को खारिज किया है।
नीरज बोले- कमीशन नहीं लेता, पुस्तकालय बनकर तैयार है
आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए नीरज कुमार ने कहा कि पुस्तकालय बना हुआ है और निर्माण की अनुशंसा करने के बदले उन्होंने कोई कमीशन नहीं लिया। उन्होंने कहा, ''मैं चुनौती देता हूं। पुस्तकालय बना हुआ है। मैं कोई कमीशन नहीं लेता।''
निर्माण की स्थिति पर सवाल उठने के बाद उन्होंने कहा कि जमीन का अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त है। उनके मुताबिक, किसी के आरोप लगा देने से वह अपनी बात नहीं बदल देंगे। उन्होंने इस मामले में मौके पर जाकर स्थिति देखने की भी चुनौती दी।
नीरज की सफाई का मुख्य आधार यह है कि जनप्रतिनिधि की भूमिका योजना की अनुशंसा करने तक होती है, जबकि उसके बाद निर्माण की प्रक्रिया संबंधित विभागीय अधिकारियों और इंजीनियरों के स्तर पर पूरी होती है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत जनप्रतिनिधि अनुशंसा करते हैं और आगे की प्रक्रिया विभाग संभालता है।
जिला योजना पदाधिकारी और कार्यपालक अभियंता से जांच कराने की बात
नीरज कुमार ने पुस्तकालय निर्माण से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए जिला योजना पदाधिकारी और कार्यपालक अभियंता से जानकारी लेने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि निर्माण से संबंधित प्रक्रिया में एग्रीमेंट, इंजीनियरिंग जांच और अन्य विभागीय औपचारिकताएं शामिल होती हैं।
उन्होंने एमवी बुक यानी माप पुस्तिका का भी उल्लेख किया। निर्माण में कितनी सामग्री लगी, काम का कितना माप दर्ज हुआ और भुगतान किस आधार पर किया गया, इन बातों का रिकॉर्ड सरकारी व्यवस्था में उपलब्ध होना चाहिए। नीरज के मुताबिक, निर्माण में इस्तेमाल सामग्री, भुगतान और जीएसटी से जुड़े विवरणों की जानकारी संबंधित विभागों से ली जा सकती है।
इस सफाई के बाद विवाद का अहम सवाल यह है कि क्या संबंधित रिकॉर्ड आरोपों और जवाब के बीच स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं। पुस्तकालय का भौतिक सत्यापन, स्वीकृत राशि, भुगतान विवरण और निर्माण की गुणवत्ता की जांच से ही मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
खंडहर होने के आरोप पर भी नीरज का पलटवार
पुस्तकालय के निर्माण के बाद उसके खंडहर होने के आरोप पर नीरज कुमार ने सवाल किया कि ऐसा कैसे हो सकता है। उन्होंने जमीन के एनओसी का हवाला देते हुए कहा कि निर्माण स्थल पर जाकर स्थिति देखी जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि पुस्तकालय बनने के बाद उसके संचालन की अलग प्रक्रिया होती है। उनके अनुसार, पहले आधारभूत संरचना तैयार होती है, फिर निबंधन और उसके बाद किताबें तथा अन्य सामग्री उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। पुस्तकालय के संचालन में जनसहयोग की भूमिका भी हो सकती है।
हालांकि, पुस्तकालय की इमारत का निर्माण और उसका नियमित संचालन दो अलग-अलग पहलू हैं। इसलिए निर्माण होने का दावा अपने आप में धन के सही इस्तेमाल या भवन की मौजूदा स्थिति से जुड़े हर सवाल का जवाब नहीं है। इसके लिए निर्माण स्थल और संबंधित दस्तावेजों की जांच जरूरी होगी।
चुनाव के बीच बढ़ी राजनीतिक चुनौती
पटना स्नातक सीट पर 23 अक्टूबर को मतदान होना है। ऐसे में पुस्तकालय निर्माण का विवाद चुनावी बहस का हिस्सा बन गया है। विपक्ष इस मुद्दे पर जवाबदेही मांग रहा है, जबकि नीरज कुमार ने आरोपों को चुनौती देते हुए विभागीय रिकॉर्ड और स्थल निरीक्षण की बात कही है।
अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण होगा कि निर्माण की स्वीकृति, एमवी बुक, भुगतान और पुस्तकालय की मौजूदा स्थिति से संबंधित दस्तावेज क्या बताते हैं। यदि आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण सामने आते हैं तो मामला राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़ सकता है। वहीं, यदि सरकारी रिकॉर्ड निर्माण और भुगतान की वैधता की पुष्टि करते हैं तो नीरज कुमार को अपनी सफाई के समर्थन में आधार मिलेगा। फिलहाल छह लाख रुपये के कथित घोटाले का आरोप और नीरज कुमार की सफाई आमने-सामने हैं। चुनावी माहौल में उठे इस विवाद का जवाब केवल बयान नहीं, बल्कि दस्तावेज और मौके पर निर्माण की वास्तविक स्थिति ही दे सकती है।