Mokama Flood : एक तरफ घरों में छाती तक पानी... दूसरी तरफ चूल्हे में आग नहीं। सामने सवाल सिर्फ इतना नहीं कि बाढ़ का पानी कब उतरेगा, बल्कि सवाल यह भी है कि जब तक पानी नहीं उतरता, तब तक पेट कैसे भरेगा? मोकामा में बाढ़ की मार झेल रहे करीब 1000 लोगों के सामने अब राहत और रसोई दोनों का संकट खड़ा हो गया है। मोकामा अंचल के ख्वाजा में बाढ़ पीड़ितों के लिए चल रहा सामुदायिक रसोई केंद्र यानी कम्युनिटी किचन बुधवार शाम से बंद कर दिया गया। इसके बाद जंजीरा दियारा से विस्थापित परिवारों की चिंता बढ़ गई है। बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि वे अपने घर लौट भी जाएं तो जाएं कैसे? घर तक पहुंचने का रास्ता पानी में डूबा है और कई जगहों पर अभी भी छाती तक पानी बताया जा रहा है। ऐसे में घर में चूल्हा जलाना तो दूर, घर के अंदर रहना भी मुश्किल है।
‘साहब, पानी में घर है... खाना कहां पकाएं?’
राहत शिविर में बैठे लोगों की परेशानी को अगर एक सवाल में समेटें तो वह है—‘अगर घर में पानी है, राहत केंद्र बंद है और रसोई भी बंद हो गई, तो आखिर खाना मिलेगा कहां से?’जंजीरा दियारा से आए लोगों का कहना है कि वे लंबे समय से राहत शिविर में रह रहे थे। उनके पास खाने-पीने का इंतजाम नहीं था और सामुदायिक रसोई से मिलने वाले भोजन पर ही परिवारों की निर्भरता थी।अब अचानक रसोई बंद होने के बाद परिवारों के सामने रोजमर्रा के भोजन का संकट खड़ा हो गया है।एक तरफ बाढ़ का पानी जैसे कह रहा हो—‘अभी घर मत लौटो...’और दूसरी तरफ बंद पड़ा कम्युनिटी किचन मानो पूछ रहा हो—‘अब खाना कहां से लाओगे?’यही सवाल इस समय जंजीरा दियारा के बाढ़ पीड़ित परिवारों के सामने खड़ा है।
‘क्या 12 दिन में बाढ़ भी खत्म हो गई?’
बाढ़ पीड़ितों की परेशानी के बीच प्रशासन की ओर से जो वजह सामने आई है, वह भी चर्चा का विषय बन गई है।स्थानीय ग्रामीण भोला सिंह ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं। इसके बाद उन्होंने मोकामा के अंचलाधिकारी यानी सीओ से बात की।सीओ की ओर से बताया गया कि जिलाधिकारी के निर्देश पर कम्युनिटी किचन को सिर्फ 12 दिनों के लिए चलाने की मंजूरी मिली थी। निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद नियमों के अनुसार रसोई बंद कर दी गई।अब यहां सबसे बड़ा सवाल यही है—‘क्या 12 दिन पूरे होते ही बाढ़ भी खत्म हो गई?’अगर पानी अभी भी घरों में है, अगर लोग अपने गांव वापस जाकर खाना नहीं बना सकते, अगर करीब 1000 लोग राहत शिविर में रह रहे हैं, तो फिर उनके भोजन का इंतजाम कौन करेगा?यही सवाल बाढ़ पीड़ित प्रशासन से पूछ रहे हैं।
प्रशासन ने भी माना—हालात अभी सामान्य नहीं
हालांकि राहत की बात यह है कि प्रशासन ने मौजूदा स्थिति को देखते हुए फिर से कम्युनिटी किचन शुरू कराने की पहल की है।सीओ ने बताया कि बाढ़ के पानी और वर्तमान स्थिति को देखते हुए जिलाधिकारी को पत्र लिखा गया है। प्रशासन की ओर से मांग की गई है कि सामुदायिक रसोई को दोबारा शुरू करने की मंजूरी दी जाए।यानी कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।लेकिन तब तक सवाल यह है कि मंजूरी आने तक इन परिवारों के चूल्हे कैसे जलेंगे?
‘घर लौटें तो पानी, शिविर में रहें तो खाना नहीं...’
जंजीरा दियारा से आए परिवारों की स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि उनके सामने दोनों तरफ परेशानी दिखाई दे रही है।घर लौटते हैं तो पानी।राहत शिविर में रहते हैं तो खाने का संकट।और अगर कहीं जाने की कोशिश करते हैं तो बाढ़ के पानी के बीच रास्ता तलाशना पड़ रहा है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि राहत केंद्र बंद होने से उन पर वापस अपने पानी से घिरे घरों की ओर लौटने का दबाव बन रहा है। हालांकि प्रशासन की ओर से कहा गया है कि कम्युनिटी किचन निर्धारित अवधि पूरी होने के कारण बंद किया गया और इसे फिर से शुरू करने के लिए जिलाधिकारी को पत्र भेजा गया है।
अब सरकार से सीधा सवाल
बाढ़ पीड़ित परिवारों ने पटना जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग की है कि जब तक दियारा क्षेत्र से पानी पूरी तरह नहीं निकल जाता और हालात सामान्य नहीं होते, तब तक राहत केंद्र और कम्युनिटी किचन चालू रखा जाए।क्योंकि बाढ़ का कैलेंडर प्रशासन की फाइल में भले 12 दिन का हो, लेकिन पानी अपनी तारीख देखकर नहीं उतरता।अब जंजीरा दियारा के करीब 1000 बाढ़ पीड़ितों की निगाह प्रशासन के अगले फैसले पर है।सवाल सीधा है—पानी उतरने तक पेट का इंतजाम कौन करेगा?और उससे भी बड़ा सवाल—‘जब घर अभी रहने लायक नहीं है, तो क्या सिर्फ कम्युनिटी किचन बंद होने से बाढ़ खत्म मान ली जाए?’