Mokama By-Election : बिहार की सियासत में मोकामा एक बार फिर बड़े राजनीतिक मुकाबले का केंद्र बनता नजर आ रहा है। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) से मोकामा विधायक अनंत सिंह के निष्कासन के बाद अब सबसे बड़ा सवाल उनकी विधानसभा सदस्यता और सीट के भविष्य को लेकर उठ रहा है। क्या अनंत सिंह की विधायकी बच जाएगी या मोकामा में उपचुनाव की नौबत आएगी? अगर उपचुनाव हुआ, तो क्या ‘छोटे सरकार’ एक बार फिर अपनी सियासी ताकत दिखाएंगे या जदयू इस सीट पर अपना नया चेहरा उतारकर राजनीतिक हिसाब बराबर करने की कोशिश करेगी? फिलहाल इन सवालों का जवाब भविष्य की कानूनी और राजनीतिक प्रक्रिया तय करेगी, लेकिन मोकामा की सियासत में हलचल तेज हो गई है।
जदयू ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी, पूर्व विधायक नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है। पार्टी ने अनंत सिंह के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की और उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त कराने के लिए विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार से संपर्क करने का फैसला किया है। हालांकि, पार्टी से निष्कासन का मतलब अपने आप विधानसभा की सदस्यता खत्म होना नहीं है। उनकी विधायकी पर अंतिम फैसला संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।
यही वजह है कि अब मोकामा की राजनीति में चर्चा केवल जदयू और अनंत सिंह के बीच टकराव तक सीमित नहीं है। निगाहें इस बात पर भी टिकी हैं कि आगे कोई कानूनी कार्रवाई होती है या नहीं और क्या इसके चलते विधानसभा सीट खाली होने की स्थिति बनती है। यदि सीट रिक्त होती है, तो नियमानुसार उपचुनाव की संभावना पैदा हो सकती है।
उपचुनाव हुआ तो मोकामा में किसका पलड़ा भारी रहेगा?
मोकामा में उपचुनाव की स्थिति बनती है, तो यह सामान्य चुनाव नहीं होगा। इसके केंद्र में अनंत सिंह का राजनीतिक प्रभाव, जदयू की संगठनात्मक ताकत और एनडीए की चुनावी रणनीति होगी। अनंत सिंह लंबे समय से मोकामा और आसपास के इलाकों की राजनीति में प्रभावशाली चेहरा रहे हैं। ऐसे में उनकी मौजूदगी या गैरमौजूदगी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि अगर उपचुनाव की नौबत आती है, तो अनंत सिंह खुद चुनाव लड़ेंगे या किसी दूसरे उम्मीदवार को समर्थन देंगे। फिलहाल इस बारे में कोई अंतिम स्थिति नहीं है। उनकी राजनीतिक रणनीति इस बात पर भी निर्भर करेगी कि उनकी विधानसभा सदस्यता को लेकर क्या फैसला होता है और चुनाव लड़ने के रास्ते में कोई कानूनी बाधा आती है या नहीं।
दूसरी ओर, जदयू के सामने भी अपनी राजनीतिक ताकत साबित करने की चुनौती होगी। पार्टी चाहेगी कि मोकामा में उसका संगठन मजबूत बना रहे और नेतृत्व के फैसले का चुनावी असर भी दिखाई दे। ऐसे में उम्मीदवार के चयन से लेकर स्थानीय नेताओं की भूमिका तक हर कदम अहम हो सकता है। भाजपा और एनडीए के दूसरे घटक दलों की रणनीति भी इस संभावित मुकाबले को दिलचस्प बना सकती है।
नीतीश कुमार से नजदीकी, फिर जदयू से टकराव तक का सफर
अनंत सिंह का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव से गुजरा है। मोकामा और बाढ़ इलाके में ‘छोटे सरकार’ के नाम से चर्चित अनंत सिंह ने 2005 में जदयू के टिकट पर विधानसभा की राजनीति में कदम रखा था। उस दौर में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राजनीति के साथ उनकी नजदीकी को उनके राजनीतिक सफर का अहम हिस्सा माना जाता था।
हालांकि, 2015 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह ने जदयू से अलग होकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की। इसके बाद भी मोकामा की राजनीति में उनका प्रभाव बना रहा। अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में उनके समीकरण बदलते रहे और पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेद भी सामने आते रहे।
बाद में उनकी राजनीति फिर जदयू के साथ जुड़ी और वह मोकामा से विधायक बने। लेकिन हालिया एमएलसी चुनाव के दौरान सामने आए विवाद ने एक बार फिर उनके और पार्टी नेतृत्व के रिश्तों को तनावपूर्ण बना दिया। आखिरकार पार्टी ने निष्कासन का फैसला लिया। अब यह विवाद केवल संगठनात्मक कार्रवाई तक सीमित रहेगा या मोकामा में नए चुनाव की जमीन तैयार करेगा, यह देखना अहम होगा।
निशांत कुमार की सक्रियता के बीच जदयू के लिए भी परीक्षा
बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के बीच जदयू की यह कार्रवाई राजनीतिक संदेश के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पार्टी के भीतर नेतृत्व की सक्रियता और संगठनात्मक अनुशासन पर जोर के बीच अनंत सिंह के खिलाफ उठाया गया कदम यह संकेत देता है कि पार्टी अपने फैसलों को लेकर सख्त रुख अपनाना चाहती है। लेकिन उपचुनाव की स्थिति बनने पर केवल अनुशासन का संदेश पर्याप्त नहीं होगा। जदयू को यह भी साबित करना होगा कि मोकामा में उसका जनाधार किसी एक चेहरे पर निर्भर नहीं है। वहीं, अनंत सिंह के सामने अपने समर्थकों को एकजुट रखने और अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन करने की चुनौती होगी।
मोकामा में उपचुनाव की तारीख अभी तय नहीं
फिलहाल मोकामा में उपचुनाव को लेकर कोई निश्चित तारीख या आधिकारिक चुनाव कार्यक्रम सामने नहीं है। सबसे पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि विधानसभा सदस्यता को लेकर कोई औपचारिक प्रक्रिया शुरू होती है या नहीं और उसका परिणाम क्या निकलता है। केवल पार्टी से निष्कासन के आधार पर सीट खाली मान लेना सही नहीं होगा। अगर आगे चलकर सीट रिक्त होती है, तो चुनाव आयोग नियमानुसार उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। तब उम्मीदवारों की घोषणा, राजनीतिक गठबंधन और स्थानीय मुद्दे चुनावी चर्चा के केंद्र में आ जाएंगे।
कुल मिलाकर, मोकामा की सियासत इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। अनंत सिंह के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती है, जबकि जदयू के लिए संगठनात्मक ताकत और जनसमर्थन साबित करने का मौका हो सकता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है। यदि उपचुनाव की स्थिति बनती है, तो मोकामा में एक बार फिर ऐसा मुकाबला देखने को मिल सकता है, जिसका असर केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बिहार की सियासत में भी इसकी गूंज सुनाई दे सकती है।