बिहार समेत देश के कई राज्यों में विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद एमएलसी यानी विधान परिषद सदस्य की चर्चा तेज हो गई है। चुनावी मैदान में उम्मीदवारों की जीत-हार, राजनीतिक दलों की रणनीति और नेताओं के बीच बयानबाजी के बीच एक सवाल आम लोगों के मन में भी उठता है कि आखिर एमएलसी होता कौन है? क्या एमएलसी भी विधायक की तरह ताकतवर होता है? उसे कितनी सैलरी मिलती है? क्या वह मुख्यमंत्री या मंत्री बन सकता है? और क्या उसे सरकारी आवास, गाड़ी, मेडिकल सुविधा और पेंशन जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं? आइए आसान भाषा में समझते हैं एमएलसी के पद, अधिकार और सुविधाओं से जुड़ी पूरी कहानी।

भारत में राज्य स्तर पर कानून बनाने की व्यवस्था मुख्य रूप से विधानसभा के जरिए चलती है। लेकिन कुछ राज्यों में विधानसभा के साथ विधान परिषद भी होती है। विधानसभा के सदस्यों को एमएलए यानी विधायक कहा जाता है, जबकि विधान परिषद के सदस्यों को एमएलसी कहा जाता है। देश में फिलहाल बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में विधान परिषद मौजूद है।

एमएलसी को राज्य की विधायिका के उच्च सदन का सदस्य माना जाता है। इसका उद्देश्य कानून बनाने की प्रक्रिया में अलग-अलग वर्गों के लोगों को प्रतिनिधित्व देना और महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार विमर्श का एक अतिरिक्त मंच उपलब्ध कराना है। खास बात यह है कि एमएलसी का चुनाव केवल आम जनता के सीधे मतदान से नहीं होता। इसके लिए अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों और निर्वाचक मंडलों की व्यवस्था है।

कैसे चुने जाते हैं एमएलसी?

एमएलसी के चुनाव की प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से काफी अलग होती है। संविधान के अनुच्छेद 171 के तहत विधान परिषद की संरचना निर्धारित की गई है। इसके मुताबिक, परिषद के सदस्यों का चुनाव अलग-अलग तरीकों से होता है।विधान परिषद की लगभग एक-तिहाई सीटों पर स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि मतदान करते हैं। इनमें संबंधित नगर निकायों और जिला स्तर के स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं। वहीं, लगभग एक बारहवीं सीटों पर स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। इन सीटों पर वोट देने के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के साथ मतदाता सूची में पंजीकरण भी जरूरी होता है।

इसी तरह, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों पर पात्र और पंजीकृत शिक्षक मतदान करते हैं। इसके अलावा लगभग एक-तिहाई सदस्यों का चुनाव विधायक करते हैं। शेष सदस्यों को राज्यपाल साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले लोगों में से मनोनीत करते हैं। यानी एमएलसी बनने के लिए केवल विधानसभा क्षेत्र की तरह आम जनता के बीच चुनाव लड़ना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। अलग-अलग वर्गों के प्रतिनिधियों और निर्वाचक मंडलों के जरिए भी विधान परिषद में पहुंचा जा सकता है।

एमएलसी के पास कितनी पावर होती है?

एमएलसी का पद केवल नाम का पद नहीं है। विधान परिषद का सदस्य सदन की कार्यवाही में हिस्सा ले सकता है, सरकार से सवाल पूछ सकता है और राज्य के महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बात रख सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, परिवहन और किसानों की समस्याओं जैसे विषयों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करना भी उसकी भूमिका का हिस्सा है।

विधान परिषद में एमएलसी सामान्य विधेयकों पर चर्चा कर सकता है। वह सरकार की नीतियों और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाकर जवाबदेही तय करने में भी भूमिका निभा सकता है। राज्य के बजट पर चर्चा करने और वित्तीय नीतियों पर अपनी राय रखने का अधिकार भी उसे मिलता है।

हालांकि, एमएलसी की शक्तियां हर मामले में विधायक के बराबर नहीं होतीं। खासकर वित्तीय मामलों में विधानसभा अधिक शक्तिशाली है। मनी बिल केवल विधानसभा में पेश किया जा सकता है। इसके पारित होने के बाद विधान परिषद अपनी सिफारिशें अधिकतम 14 दिनों के भीतर दे सकती है। विधानसभा उन सिफारिशों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं होती। सरकार बनाने के मामले में भी विधानसभा की भूमिका सबसे अहम होती है। राज्य सरकार विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है और सरकार बनाने के लिए विधान परिषद में बहुमत जरूरी नहीं है।

क्या एमएलसी मुख्यमंत्री या मंत्री बन सकता है?

इस सवाल का जवाब है-हां। संविधान के तहत मुख्यमंत्री और मंत्री बनने के लिए किसी व्यक्ति का केवल विधानसभा का सदस्य होना जरूरी नहीं है। विधान परिषद का सदस्य भी मुख्यमंत्री या मंत्री बन सकता है, बशर्ते संवैधानिक शर्तें पूरी हों। अगर कोई मंत्री नियुक्ति के समय राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर सदस्य बनना होता है। इसी तरह मुख्यमंत्री पद के लिए भी संवैधानिक प्रावधान लागू होते हैं। इसलिए यह मानना गलत होगा कि एमएलसी केवल सदन में बैठकर सवाल पूछने तक सीमित रहता है।

एमएलसी को कितनी मिलती है सैलरी?

एमएलसी की सैलरी को लेकर लोगों में काफी दिलचस्पी रहती है। हालांकि, पूरे देश में इसके लिए एक समान वेतन व्यवस्था नहीं है। हर राज्य अपने कानूनों और नियमों के मुताबिक सदस्यों का वेतन, भत्ते और सुविधाएं निर्धारित करता है।एमएलसी को मिलने वाली रकम को मुख्य रूप से तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला, मूल वेतन। दूसरा, निर्वाचन क्षेत्र, यात्रा, कार्यालय और अन्य आधिकारिक कार्यों से जुड़े भत्ते। तीसरा, आवास, चिकित्सा और संचार जैसी सुविधाएं।

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मूल वेतन 35 हजार रुपये और विभिन्न भत्तों को मिलाकर कुल मासिक राशि लगभग 2.66 लाख रुपये बताई गई है। लेकिन इसे देश के सभी एमएलसी की सैलरी नहीं माना जा सकता। बिहार समेत अन्य राज्यों में वेतन और भत्तों की राशि संबंधित राज्य के लागू नियमों पर निर्भर करती है। इसके अलावा सभी भत्ते सीधे नकद आय नहीं होते; कुछ आधिकारिक खर्चों की प्रतिपूर्ति के लिए दिए जाते हैं।

सरकारी आवास से लेकर पेंशन तक की सुविधा

वेतन के अलावा एमएलसी को कई तरह की सुविधाएं मिल सकती हैं। इनमें राजधानी में सरकारी आवास या आवास भत्ता, आधिकारिक यात्राओं के लिए यात्रा भत्ता, चिकित्सा सुविधा और टेलीफोन या संचार संबंधी खर्च शामिल हो सकते हैं।कुछ राज्यों में कार्यालय संचालन, स्टेशनरी, कंप्यूटर और सचिवीय सहायता के लिए भी निर्धारित व्यवस्था होती है। सदन या समिति की बैठकों में शामिल होने पर नियमानुसार दैनिक भत्ता भी मिल सकता है। हालांकि, इन सुविधाओं की उपलब्धता और सीमा अलग-अलग राज्यों में अलग होती है। पूर्व एमएलसी को पेंशन का लाभ भी मिल सकता है। लेकिन पेंशन की पात्रता, उसकी राशि और अन्य शर्तें संबंधित राज्य के कानूनों पर निर्भर करती हैं। इसलिए किसी एक राज्य की सुविधा को दूसरे राज्य पर लागू मानना सही नहीं होगा।

छह साल का होता है एमएलसी का कार्यकाल

एमएलसी और एमएलए के बीच एक बड़ा अंतर उनके कार्यकाल का भी है। विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल होता है, जबकि विधान परिषद एक स्थायी सदन है। इसे विधानसभा की तरह भंग नहीं किया जाता। विधान परिषद के प्रत्येक सदस्य का सामान्य कार्यकाल छह साल होता है। हर दो साल में लगभग एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं और उनकी सीटों पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत चुनाव कराया जाता है। इससे सदन में अनुभवी सदस्यों की निरंतरता बनी रहती है।

कुल मिलाकर, एमएलसी का पद राज्य की राजनीति और कानून बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह सरकार से सवाल पूछने, जनहित के मुद्दे उठाने और विधेयकों पर चर्चा करने का अधिकार रखता है। लेकिन विधानसभा की तुलना में उसकी शक्तियां खासकर वित्तीय मामलों और सरकार की जवाबदेही के संदर्भ में सीमित हैं। वहीं, सैलरी, सरकारी सुविधाओं और पेंशन का लाभ कितना मिलेगा, यह संबंधित राज्य के नियम तय करते हैं।