Bihar News : बिहार की राजनीति में MLA और MLC जैसे शब्द अक्सर सुनने को मिलते हैं। चुनाव के दौरान इनकी चर्चा और बढ़ जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि विधायक (MLA) और विधान पार्षद (MLC) के चुनाव की प्रक्रिया अलग-अलग होती है? दोनों जनप्रतिनिधि हैं, लेकिन सदन की सदस्यता, कार्यकाल, चुनाव के तरीके और कानून बनाने में उनकी भूमिका के बीच कई अहम अंतर हैं।
MLA का पूरा नाम Member of Legislative Assembly यानी विधानसभा सदस्य है। वहीं MLC का अर्थ Member of Legislative Council यानी विधान परिषद सदस्य होता है। विधानसभा राज्य का प्रमुख निर्वाचित सदन है, जबकि विधान परिषद उच्च सदन के रूप में काम करती है। हालांकि, हर राज्य में विधान परिषद नहीं होती। बिहार उन राज्यों में शामिल है, जहां विधानसभा के साथ विधान परिषद भी मौजूद है।
MLA और MLC के चुनाव में सबसे बड़ा अंतर यह है कि विधानसभा सदस्य को आम तौर पर जनता सीधे वोट देकर चुनती है। राज्य को विधानसभा क्षेत्रों में बांटा जाता है और प्रत्येक क्षेत्र से एक विधायक चुना जाता है। चुनाव में सबसे अधिक वैध वोट हासिल करने वाला उम्मीदवार विजयी होता है। इसके लिए उम्मीदवार की उम्र कम से कम 25 वर्ष होनी चाहिए और उसे संविधान तथा चुनाव कानूनों में निर्धारित अन्य योग्यताएं भी पूरी करनी होती हैं।
दूसरी ओर, MLC का चुनाव कई अलग-अलग तरीकों से होता है। विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या का लगभग एक-तिहाई हिस्सा स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के निर्वाचन से चुना जाता है। करीब एक-बारहवां हिस्सा स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से और एक-बारहवां हिस्सा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुना जाता है। इसके अलावा, लगभग एक-तिहाई सदस्यों का चुनाव विधानसभा के निर्वाचित विधायक करते हैं। शेष सदस्यों को राज्यपाल साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान के आधार पर मनोनीत करते हैं। MLC बनने के लिए न्यूनतम उम्र 30 वर्ष निर्धारित है।
विधान परिषद के चुनाव में हर सीट पर आम जनता को सीधे वोट देने का अधिकार नहीं होता। मतदाता का अधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि चुनाव किस श्रेणी का है। उदाहरण के लिए, स्नातक सीटों पर संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज योग्य स्नातक वोट देते हैं, जबकि शिक्षक सीटों पर निर्धारित शर्तें पूरी करने वाले पंजीकृत शिक्षक मतदान करते हैं। विधानसभा सदस्यों द्वारा चुनी जाने वाली सीटों पर निर्वाचित विधायक वोट डालते हैं।
कार्यकाल की बात करें तो सामान्य स्थिति में MLA का कार्यकाल विधानसभा के गठन से पांच साल तक होता है, बशर्ते विधानसभा पहले भंग न हो जाए। MLC का कार्यकाल छह साल का होता है। विधान परिषद स्थायी सदन है, इसे विधानसभा की तरह भंग नहीं किया जाता। इसके लगभग एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं और उनकी जगह नए सदस्य आते हैं।
अब सवाल है कि अधिकारों के मामले में कौन आगे है? विधानसभा और विधान परिषद दोनों कानून बनाने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं, लेकिन दोनों की शक्तियां समान नहीं हैं। सामान्य विधेयकों पर विधान परिषद चर्चा कर सकती है, संशोधन सुझा सकती है और विधेयक को कुछ समय तक रोक सकती है। हालांकि, संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के तहत विधानसभा दोबारा विधेयक पारित कर दे तो विधान परिषद उसे अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकती।
धन विधेयक के मामले में विधानसभा की भूमिका अधिक निर्णायक होती है। धन विधेयक केवल विधानसभा में पेश किया जा सकता है। विधान परिषद को अपनी सिफारिशें देने के लिए 14 दिन का समय मिलता है। विधानसभा उन सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। इसी तरह, राज्य सरकार की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है, विधान परिषद के प्रति नहीं।
दोनों जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र और जनता की समस्याएं सरकार के सामने रखने, सदन में सवाल पूछने तथा चर्चा में हिस्सा लेने का अधिकार होता है। हालांकि, MLA और MLC का प्रतिनिधित्व क्षेत्र और निर्वाचन व्यवस्था के आधार पर अलग हो सकता है। MLA किसी विधानसभा क्षेत्र का सीधे निर्वाचित प्रतिनिधि होता है, जबकि MLC स्थानीय निकायों, शिक्षकों, स्नातकों या अन्य निर्धारित निर्वाचन व्यवस्थाओं के माध्यम से सदन तक पहुंचता है।
वेतन, भत्ते और सुविधाओं की बात करें तो इनकी राशि हर राज्य में अलग हो सकती है। बिहार में MLA और MLC के वेतन-भत्ते राज्य के लागू कानूनों और सरकारी नियमों के अनुसार निर्धारित होते हैं। इसलिए दोनों का सटीक मासिक वेतन, क्षेत्रीय भत्ता, यात्रा सुविधा और अन्य लाभ जानने के लिए बिहार सरकार के नवीनतम आधिकारिक आदेश देखना जरूरी है। केवल पद के नाम के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि दोनों को हर मद में बिल्कुल समान राशि मिलती है।
कुल मिलाकर, MLA और MLC दोनों राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अहम हिस्से हैं। MLA सीधे जनता के वोट से विधानसभा पहुंचता है, जबकि MLC के चयन के लिए कई अलग-अलग निर्वाचन श्रेणियां और मनोनयन की व्यवस्था है। कानून बनाने में दोनों की भूमिका है, लेकिन सरकार की जवाबदेही और धन विधेयक जैसे मामलों में विधानसभा को विशेष अधिकार प्राप्त हैं।