पटना: मीठापुर-महुली एलिवेटेड रोड के उद्घाटन के बाद जहां राजधानी के लोगों को ट्रैफिक से राहत की उम्मीद जगी है, वहीं परसा-संपतचक इलाके के लिए एक बड़ा पेंच सामने आ गया है। एलिवेटेड रोड से परसा-संपतचक की ओर उतरने वाला प्रस्तावित रैंप फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया है। कभी जिस रैंप के लिए जमीन अधिग्रहण तक की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, अब उसी योजना पर प्रशासनिक और तकनीकी समीक्षा के बाद रोक लगा दी गई है।
खास बात यह है कि इस रैंप के लिए 27.74 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की गई थी और बिहार राज्य पथ विकास निगम की ओर से 15 करोड़ रुपये भू-अर्जन कार्यालय के खाते में ट्रांसफर भी किए जा चुके थे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब योजना पर इतना आगे काम हो चुका था, तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि रैंप पर ब्रेक लग गया?
24 फरवरी की बैठक के बाद बदली तस्वीर
प्रस्तावित रैंप के निर्माण को लेकर 24 फरवरी 2026 को डीएम की अध्यक्षता में पीएमजी समीक्षा बैठक हुई थी। इसी बैठक में रैंप का निर्माण रोकने पर सहमति बनी। इसके बाद 18 मार्च को बिहार राज्य पथ विकास निगम के उप महाप्रबंधक प्रेम शंकर ने जिला भू-अर्जन पदाधिकारी को पत्र भेजकर जमीन अधिग्रहण और मुआवजा भुगतान की प्रक्रिया रोकने का निर्देश दिया। यानी जिस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए जमीन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, वह अचानक प्रशासनिक समीक्षा के बाद रुक गई।
28 अगस्त को पूरा हुआ 8.8 किमी का एलिवेटेड रोड
मीठापुर-महुली एलिवेटेड रोड का 2.1 किलोमीटर हिस्सा 28 अगस्त को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने लोकार्पित किया। इसके साथ ही करीब 8.8 किलोमीटर लंबे इस एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण पूरा हो गया है। लेकिन परसा-संपतचक रैंप के नहीं बनने से आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों की कनेक्टिविटी को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। फिलहाल यह रैंप तभी बन सकेगा, जब सरकार दोबारा इस पर हरी झंडी देगी।
क्यों रोका गया रैंप? जाम और हादसे का डर
रैंप रोकने के पीछे सबसे बड़ा कारण ट्रैफिक व्यवस्था और सड़क सुरक्षा को बताया जा रहा है। निगम के अधिकारियों के अनुसार, यहां डाउन रैंप बनाने का प्रस्ताव था। आशंका यह थी कि स्थानीय लोग इसका इस्तेमाल केवल नीचे उतरने के लिए नहीं, बल्कि एलिवेटेड रोड पर चढ़ने के लिए भी करने लगेंगे। ऐसे में मुख्य एलिवेटेड कॉरिडोर पर वाहनों का दबाव बढ़ सकता है। इससे जाम की स्थिति बनने के साथ दुर्घटना की आशंका भी बढ़ने की बात कही गई है।
तकनीकी रूप से एक और अहम बात सामने आई है। जिस स्थान पर रैंप प्रस्तावित था, वहां से महज करीब एक किलोमीटर आगे एलिवेटेड रोड सीधे एट-ग्रेड यानी समतल सड़क से जुड़ती है। इसी वजह से अधिकारियों को लगा कि वहां अलग रैंप बनाने की उपयोगिता और सुरक्षा दोनों की दोबारा समीक्षा जरूरी है। अब इस पूरे मामले में निगम ने मुख्यालय से अंतिम दिशा-निर्देश मांगा है। यानी रैंप की फाइल बंद नहीं हुई है, लेकिन फिलहाल निर्माण की प्रक्रिया पर रोक जरूर है।
जनप्रतिनिधियों ने फिर उठाई रैंप की मांग
रैंप पर रोक के बावजूद स्थानीय जनप्रतिनिधियों की ओर से इसे दोबारा शुरू कराने की मांग तेज हो गई है।
ग्रामीण विकास मंत्री ने सीएम को लिखा पत्र
ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने 22 मई 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर पुराने परसा बाजार मोड़-संपतचक रोड के पास फ्लाईओवर बनाकर उसे मीठापुर-महुली एलिवेटेड रोड से जोड़ने की मांग की थी। उन्होंने अपने पत्र में परियोजना के पुराने घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, 26 जुलाई 2023 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मीठापुर-महुली एलिवेटेड रोड की प्रगति का जायजा लिया था। इसके बाद रैंप के लिए जमीन अधिग्रहण की दिशा में राशि भी उपलब्ध कराई गई। उन्होंने 16 जून 2025 के उस घटनाक्रम का भी जिक्र किया, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ने तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा तथा तत्कालीन पथ निर्माण मंत्री नितिन नवीन की मौजूदगी में रैंप उतारने की बात कही थी।
विधायक अरुण मांझी ने भी लिखा पत्र
24 मई 2026 को विधायक अरुण मांझी ने भी मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर रैंप का निर्माण दोबारा शुरू कराने का आग्रह किया। विधायक ने इसे जनहित से जुड़ा महत्वपूर्ण काम बताते हुए सरकार से पुन: आदेश जारी करने की मांग की।
5 लाख आबादी को हो सकता है सीधा फायदा
स्थानीय लोगों के लिए इस रैंप की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चिपुरा पंचायत के मुखिया सतीश कुमार के मुताबिक रेलवे लाइन के पूर्वी हिस्से में रहने वाली करीब 5 लाख की आबादी को इसका सीधा फायदा मिल सकता है। रैंप बनने पर संपतचक और परसा बाजार की ओर जाने वाले लोगों को मौजूदा जाम वाले रास्तों पर निर्भरता कम हो सकती है और वे सीधे एलिवेटेड रोड से जुड़ सकेंगे।
अब असली सवाल यही है—क्या सरकार तकनीकी आपत्तियों को दूर कर परसा-संपतचक रैंप को फिर मंजूरी देगी, या 15 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद यह योजना फाइलों में ही अटक जाएगी? फिलहाल गेंद सरकार और पथ निर्माण विभाग के पाले में है।