पटना/नई दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय टीम का ऐलान हो चुका है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने संगठन में कई पुराने चेहरों को नई जिम्मेदारियां दी हैं, वहीं कई नेताओं की संगठन में वापसी भी हुई है। महत्वपूर्ण राज्यों के लिए प्रभारी और सह-प्रभारी भी तय कर दिए गए हैं। लेकिन इस पूरी सूची में दो ऐसे नाम गायब हैं, जिनकी चर्चा भाजपा के अंदर और बाहर लंबे समय से होती रही है—धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय।
दोनों नेताओं का नई राष्ट्रीय टीम में शामिल नहीं होना इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि हाल के महीनों में दोनों की राजनीतिक भूमिका में बड़ा बदलाव आया है। धर्मेंद्र प्रधान केंद्रीय मंत्रिपरिषद से बाहर हुए, जबकि बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद मंगल पांडेय को राज्य मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि दोनों नेताओं को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देकर सक्रिय किया जा सकता है। लेकिन नई टीम के ऐलान के बाद यह उम्मीद भी फिलहाल पूरी होती नहीं दिखी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या दोनों नेताओं को भाजपा ने फिलहाल संगठन से दूर रखा है? क्या यह सिर्फ अस्थायी इंतजार है या फिर पार्टी की रणनीति में दोनों के लिए कोई अलग भूमिका तय की जा रही है?
धर्मेंद्र प्रधान के सामने अब क्या विकल्प?
धर्मेंद्र प्रधान भाजपा के उन नेताओं में रहे हैं, जिन्होंने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में लंबे समय तक महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। ओडिशा की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले प्रधान को राष्ट्रीय संगठन और चुनावी रणनीति का भी अनुभवी नेता माना जाता है।केंद्रीय मंत्रिपरिषद से बाहर होने के बाद यह माना जा रहा था कि पार्टी संगठन में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल सकती है। खासकर इसलिए क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्हें अहम चुनावी जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन नई राष्ट्रीय टीम में उनका नाम नहीं आया।यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है। क्या भाजपा धर्मेंद्र प्रधान को राष्ट्रीय संगठन से अलग किसी विशेष चुनावी जिम्मेदारी में इस्तेमाल करेगी? क्या उन्हें किसी बड़े राज्य का चुनाव प्रभारी बनाया जा सकता है? या फिर पार्टी फिलहाल उन्हें किसी नई भूमिका के लिए इंतजार करवा रही है? 2027 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में प्रधान जैसे अनुभवी नेता को पूरी तरह निष्क्रिय रखना भाजपा के लिए कितना व्यावहारिक होगा, यह भी चर्चा का विषय है।
मंगल पांडेय के लिए भी बढ़ा इंतजार
बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता मंगल पांडेय की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। लंबे समय तक बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे पांडेय पार्टी संगठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। वह बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्य के प्रभारी की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। 15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बनी नई सरकार में मंगल पांडेय को मंत्री नहीं बनाया गया। इसके बाद कयास लगाए जाने लगे कि भाजपा उन्हें राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी देकर दिल्ली बुला सकती है।
लेकिन नितिन नवीन की नई टीम में मंगल पांडेय का नाम भी नहीं आया। यही वजह है कि बिहार भाजपा के राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है—क्या मंगल पांडेय को अभी किसी नई जिम्मेदारी का इंतजार करना होगा? क्या उन्हें आगामी विधानसभा चुनावों में संगठन की ओर से कोई बड़ी भूमिका दी जाएगी? या फिर पार्टी फिलहाल बिहार की राजनीति से जुड़े समीकरणों को देखते हुए उन्हें किसी दूसरे मोर्चे पर भेजने की तैयारी में है?
यूपी, पंजाब और गुजरात में दूसरे नेताओं को मिली जिम्मेदारी
2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर अपनी तैयारी शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश में विनोद तावड़े को प्रभारी बनाया गया है, जबकि पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में भी नए प्रभारियों की घोषणा हो चुकी है।ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय के लिए तत्काल सबसे बड़ी संगठनात्मक भूमिका की संभावना कुछ कम जरूर हुई है। हालांकि इसका यह मतलब नहीं कि दोनों को चुनावी जिम्मेदारियों से पूरी तरह बाहर कर दिया गया है।भाजपा चुनावी रणनीति में अक्सर राष्ट्रीय पदाधिकारी और चुनाव प्रभारी की भूमिकाओं को अलग-अलग रखती है। इसलिए संभव है कि आने वाले महीनों में दोनों नेताओं को किसी राज्य की विशेष जिम्मेदारी दी जाए।
क्या दोनों का 'वनवास' लंबा चलेगा?
भाजपा में राष्ट्रीय पदाधिकारियों की सूची में नाम नहीं होना अपने आप में किसी नेता के राजनीतिक भविष्य पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। पार्टी में संसदीय बोर्ड, चुनाव समितियों, राज्यों के प्रभारी और चुनावी अभियानों के लिए अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारियां तय होती हैं।यही कारण है कि धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय के मामले में फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। क्या दोनों नेताओं को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देने के बजाय चुनावी राज्यों में इस्तेमाल किया जाएगा? क्या पार्टी उन्हें आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए सुरक्षित रख रही है? क्या संसदीय बोर्ड या किसी अन्य महत्वपूर्ण संगठनात्मक व्यवस्था में दोनों को जगह मिल सकती है?इन सवालों के जवाब आने वाले कुछ सप्ताह या महीनों में मिल सकते हैं।
फिलहाल इतना जरूर है कि भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में दो अनुभवी नेताओं की गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर नई चर्चा को जन्म दे दिया है। धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय दोनों ही संगठन और चुनावी राजनीति का लंबा अनुभव रखते हैं। ऐसे में भाजपा उन्हें पूरी तरह किनारे करेगी, इसकी संभावना कम ही मानी जा रही है। अब निगाह इस बात पर है कि नितिन नवीन की टीम के बाहर रह गए ये दोनों बड़े चेहरे अगली बार किस भूमिका में दिखाई देंगे—संगठन में, चुनावी मैदान में या फिर किसी बिल्कुल नई जिम्मेदारी के साथ।