पटना: बिहार विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने जेडीयू के भीतर एक ऐसी राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है, जिसे अब सिर्फ चुनावी हार-जीत कहकर टाला नहीं जा सकता। 8 सीटों में से 7 सीटों के नतीजे आधिकारिक तौर पर सामने आने के बाद जहां पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार की जीत को लेकर पार्टी जश्न मना रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ सीटों पर प्रदर्शन को लेकर संगठन और नेतृत्व की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा पटना स्नातक और दरभंगा शिक्षक निर्वाचन सीट को लेकर है। राजनीतिक गलियारों में इन दोनों सीटों को लेकर अलग-अलग समीकरण की चर्चा पहले से थी। एक सीट पर पार्टी के भीतर एक बड़े नेता के करीबी माने जाने वाले खेमे की सक्रियता को लेकर सवाल उठे, तो दूसरी सीट पर पार्टी के ही एक सीनियर विधायक के विरोध की चर्चा रही।अब नतीजे आने के बाद इन चर्चाओं ने जेडीयू की अंदरूनी राजनीति का रूप ले लिया है।

ललन कैंप से आया सवाल, निशाने पर कौन?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा है जेडीयू नेता और ललन सिंह समर्थक बोंडील सिंह का फेसबुक पोस्ट। पोस्ट में उन्होंने सीधे तौर पर चुनावी हार की जिम्मेदारी तय करने, समीक्षा करने और आत्ममंथन की जरूरत बताई है।खास बात यह है कि यह सवाल ऐसे समय उठा है जब पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर पहले से ही अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों की चर्चा होती रही है। बोंदिल सिंह की पहचान ललन सिंह समर्थक नेता के तौर पर होती है। ऐसे में उनका यह पोस्ट महज एक कार्यकर्ता की नाराजगी है या इसके पीछे पार्टी के भीतर चल रही किसी बड़ी राजनीतिक बेचैनी की झलक है, यह सवाल अब चर्चा में है।

बोंडील सिंह ने लिखा है—आचार्य चाणक्य ने कहा है :- समय रहते संभल जाओ, नहीं तो पछतावा का भी समय आपके पास नहीं होगा ! जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जी के गृह क्षेत्र में जदयू के उम्मीदवार चौथे स्थान पर चले गए ! बीजेपी ने यहां भी एक चाल चली, बीजेपी के पुराने कार्यकर्ता  जनसुराज के उम्मीदवार बने और जीते !जदयू के प्रदेश अध्यक्ष जी के गृह क्षेत्र में जदयू के उम्मीदवार भी चुनाव हार गए ! अन्य क्षेत्रों में करारी हार का ,जवाबदेह कौन ? जिम्मेदार कौन ?यह कौन तय करेगा,इसकी समीक्षा जरूर होनी चाहिए !

दूसरी तरफ जदयू का एलायंस पार्टनर बीजेपी 4 सीट पर चुनाव लड़कर 5 सीटों पर जीत हासिल करता है !नीरज जी का जीत हुआ है,पार्टी जश्न मना रही है जश्न ज़रूर मनाया जाना चाहिए साथ साथ अन्य तीन सीटों पर करारी हार की जिम्मेवारी जवाबदेही समीक्षा आत्मंथन, चिंतन जरूरी है !मैं भी अपने जीवन का 22 वर्ष (2004 - 2026) पार्टी को दिया हूँ !चुनाव परिणाम देखकर बहुत दु:ख हुआ इसलिए लिखा हूँ !

पोस्ट की टाइमिंग ने बढ़ाया सियासी मतलब

बोंदिल सिंह के पोस्ट में किसी नेता का सीधे नाम लेकर हमला नहीं किया गया है। लेकिन राजनीतिक भाषा में देखें तो पोस्ट की टाइमिंग और उसमें उठाए गए सवाल काफी कुछ कह रहे हैं।एक तरफ पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के गृह क्षेत्र में जेडीयू के कमजोर प्रदर्शन का सवाल उठाया गया है। दूसरी तरफ प्रदेश अध्यक्ष के गृह क्षेत्र में भी हार का जिक्र है। इसके बाद सवाल आता है—“अन्य क्षेत्रों में करारी हार का जवाबदेह कौन? जिम्मेदार कौन?”

यही लाइन इस पोस्ट को सामान्य चुनावी प्रतिक्रिया से अलग करती है।क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उम्मीदवार क्यों हारा। सवाल यह है कि उम्मीदवार के पीछे संगठन कितना खड़ा था, चुनावी मैनेजमेंट किसके हाथ में था और पार्टी के बड़े नेताओं ने अपनी जिम्मेदारी कितनी निभाई?

बीजेपी की सफलता ने भी बढ़ाई बेचैनी

बोंडील सिंह ने अपने पोस्ट में जेडीयू की तुलना बीजेपी से भी की है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गठबंधन सहयोगी बीजेपी ने अपने प्रदर्शन से अलग तस्वीर पेश की।यही तुलना अब जेडीयू के लिए ज्यादा असहज करने वाली हो सकती है। क्योंकि गठबंधन में जब एक दल बेहतर प्रदर्शन करता है और दूसरा अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाता, तो स्वाभाविक तौर पर संगठन और रणनीति पर सवाल उठते हैं। पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार की जीत ने जेडीयू को जरूर बड़ी राहत दी है। लेकिन पार्टी के लिए चुनौती यह है कि इस जीत के जश्न के बीच बाकी सीटों की हार को कैसे देखा जाए।

नीरज की जीत बनाम बाकी सीटों की हार

यही इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू है।नीरज कुमार की जीत जेडीयू के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस चुनाव में उनके खिलाफ पार्टी के अंदर से ही विरोध और बाहरी समर्थन के अलग-अलग समीकरणों की चर्चा रही। नतीजा आखिरकार नीरज के पक्ष में गया।लेकिन अब सवाल यह है कि क्या एक सीट की जीत बाकी सीटों पर हुए नुकसान को ढक सकती है?बोंडील सिंह का पोस्ट इसी जगह पर चोट करता है। उन्होंने नीरज की जीत पर जश्न मनाने का समर्थन किया है, लेकिन साथ ही बाकी सीटों पर हार की “जिम्मेवारी, जवाबदेही, समीक्षा, आत्ममंथन और चिंतन” की जरूरत बताई है। यानी संदेश साफ है—जीत का जश्न मनाइए, लेकिन हार का हिसाब भी कीजिए।

क्या यह ललन बनाम नेतृत्व की नई पारी है?

राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या इस पोस्ट को जेडीयू के भीतर ललन सिंह कैंप बनाम मौजूदा नेतृत्व की खींचतान के संकेत के तौर पर देखा जाए? फिलहाल बोंडील सिंह ने किसी नेता का नाम लेकर सीधा हमला नहीं किया है। इसलिए इसे आधिकारिक तौर पर किसी गुट की तरफ से हमला कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि पोस्ट ने उन सवालों को सार्वजनिक कर दिया है जो चुनाव परिणाम के बाद पार्टी के भीतर उठ सकते थे।खासकर तब, जब पोस्ट लिखने वाला नेता खुद पार्टी में लंबे समय से रहने की बात करते हुए कह रहा है कि उसने 2004 से 2026 तक 22 वर्ष पार्टी को दिए हैं और चुनाव परिणाम देखकर उसे दुख हुआ है।इसलिए यह सिर्फ फेसबुक पोस्ट नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर मौजूद असंतोष की एक राजनीतिक अभिव्यक्ति के तौर पर भी पढ़ा जा रहा है।अब देखना दिलचस्प होगा कि जेडीयू इस सवाल का जवाब चुनावी समीक्षा के जरिए देती है या फिर इसे महज एक नेता की निजी प्रतिक्रिया मानकर आगे बढ़ जाती है।क्योंकि विधान परिषद चुनाव ने जेडीयू के सामने एक बड़ा सवाल जरूर रख दिया है—नीरज की जीत का जश्न तो मन गया, लेकिन जिन सीटों पर पार्टी पिछड़ी, वहां हार की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?