लखीसराय : सावन की तीसरी सोमवारी पर लखीसराय के प्रसिद्ध अशोक धाम मंदिर में सोमवार सुबह अचानक मची भगदड़ ने पूजा-अर्चना के लिए पहुंचे श्रद्धालुओं को झकझोर दिया। मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में कांवरिया और श्रद्धालु मौजूद थे। इसी दौरान भीड़ के दबाव के बीच अफरातफरी की स्थिति बनी और देखते ही देखते लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे। हादसे में सात कांवरियों की मौत की पुष्टि की गई है, जबकि एक दर्जन से अधिक लोगों के घायल होने की सूचना है।
प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, हादसे की सबसे बड़ी वजह अचानक बढ़ा भीड़ का दबाव और सीमित जगह में श्रद्धालुओं का एक साथ आगे बढ़ना मानी जा रही है। हालांकि भगदड़ शुरू होने की वास्तविक वजह क्या थी, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। घटना के बाद प्रशासन और पुलिस ने राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया तथा घायलों को अस्पताल पहुंचाया।
मंदिर के बाहर कैसे बिगड़े हालात?
सोमवारी के कारण सुबह से ही अशोक धाम मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने लगी थी। दूर-दराज से कांवर लेकर पहुंचे श्रद्धालु बाबा भोलेनाथ को जल चढ़ाने के लिए कतार में खड़े थे। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई। भीड़ एक सीमित रास्ते और प्रवेश-निकास व्यवस्था से आगे बढ़ रही थी।
ऐसे माहौल में अगर आगे की ओर अचानक लोगों की गति रुक जाए और पीछे से लगातार भीड़ आती रहे तो दबाव तेजी से बढ़ जाता है। यही स्थिति भगदड़ का कारण बन सकती है। सोमवार की सुबह अशोक धाम में भी कुछ ऐसा ही हुआ। लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला और कई श्रद्धालु जमीन पर गिर पड़े।
एक-दूसरे के ऊपर गिरते गए लोग
भगदड़ की स्थिति में सबसे खतरनाक परिस्थिति उस समय बनी जब आगे चल रहे कुछ लोग गिर गए। उनके पीछे मौजूद लोगों को इसका अंदाजा नहीं हुआ और भीड़ का दबाव लगातार बना रहा। इससे जमीन पर गिरे लोगों के ऊपर दूसरे लोग भी गिरते चले गए।
भीड़ में मौजूद लोगों के लिए तत्काल बाहर निकलने की जगह तलाशना भी मुश्किल हो गया। चीख-पुकार के बीच लोग अपने परिजनों और साथ आए कांवरियों को खोजने लगे। इस दौरान कई लोगों को चोटें आईं।
क्या भीड़ नियंत्रण में चूक हुई?
इस हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रहा है। सावन की सोमवारी पर अशोक धाम में हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में प्रवेश और निकास के लिए अलग-अलग रास्ते, बैरिकेडिंग, कतार की पर्याप्त व्यवस्था, भीड़ के दबाव की लगातार निगरानी और पर्याप्त पुलिस बल बेहद जरूरी होता है।
भगदड़ जैसी घटना अचानक हो सकती है, लेकिन इसके खतरे को कम करने के लिए प्रशासन को पहले से भीड़ के संभावित दबाव का आकलन करना पड़ता है। खासकर सुबह के समय जब श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है, तब किसी एक जगह पर भीड़ जमा होने से रोकना अहम होता है।
क्या किसी अफवाह से मची भगदड़?
हादसे के बाद यह सवाल भी सामने आ सकता है कि क्या किसी अफवाह, धक्का-मुक्की या किसी अन्य अचानक घटना से भगदड़ शुरू हुई। हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर अभी किसी एक कारण को अंतिम रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।
पुलिस और प्रशासन की जांच में यह पता लगाने की जरूरत होगी कि भगदड़ शुरू होने से ठीक पहले मंदिर परिसर में क्या स्थिति थी। सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और मौके पर तैनात सुरक्षाकर्मियों से मिली जानकारी से घटनाक्रम की कड़ी जोड़ी जा सकती है।
अस्पतालों में पहुंचाए गए घायल
हादसे के बाद मौके पर अफरातफरी मच गई। पुलिस और स्थानीय लोगों की मदद से घायल श्रद्धालुओं को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। गंभीर रूप से घायल लोगों को बेहतर इलाज के लिए दूसरे अस्पतालों में रेफर किए जाने की स्थिति भी बन सकती है। प्रशासन की ओर से घायलों के इलाज और मृतकों की पहचान की प्रक्रिया की जा रही है।
सात मौतों के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
अशोक धाम की घटना ने एक बार फिर बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन की चुनौती सामने ला दी है। धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आस्था के साथ उनकी सुरक्षा भी प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। खासकर सावन की सोमवारी जैसे अवसरों पर लाखों की संख्या में लोग विभिन्न शिवालयों में पहुंचते हैं।
अशोक धाम हादसे में सात लोगों की मौत के बाद अब यह जांच महत्वपूर्ण होगी कि वहां कितने सुरक्षाकर्मी तैनात थे, प्रवेश-निकास की क्या व्यवस्था थी, बैरिकेडिंग कैसी थी और भीड़ की निगरानी कैसे की जा रही थी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि भीड़ का दबाव बढ़ने पर उसे नियंत्रित करने के लिए मौके पर मौजूद व्यवस्था कितनी प्रभावी थी।
फिलहाल हादसे ने सात परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि भगदड़ की शुरुआत किस वजह से हुई और इसे रोकने में कौन-कौन सी व्यवस्थाएं नाकाफी साबित हुईं।