Bihar News :  बिहार विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद जनता दल यूनाइटेड (JDU) के भीतर सियासी घमासान के संकेत मिलने लगे हैं। चुनाव में पार्टी की करारी हार की समीक्षा के लिए बुलाई गई बैठक में सहयोगी दल भाजपा के साथ-साथ अपने ही नेताओं की भूमिका पर सवाल उठे। लेकिन इस पूरी बैठक में सबसे ज्यादा चर्चा केंद्रीय मंत्री और जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को लेकर हुई। पार्टी के इकलौते विजयी उम्मीदवार नीरज कुमार ने ललन सिंह के खिलाफ सीधे मोर्चा खोलते हुए उनकी भूमिका पर लिखित शिकायत सौंप दी। नीरज कुमार ने आरोप लगाया कि ललन सिंह ने पार्टी के उम्मीदवार के बजाय जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी की मदद की। इस शिकायत ने जेडीयू के अंदर चल रही खींचतान को एक नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है।


दरअसल, बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए हुए चुनाव में जेडीयू ने चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से पार्टी को केवल पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जीत मिली, जबकि तीन सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी नेतृत्व ने हार के कारणों का पता लगाने और संगठन की कमजोरियों को समझने के लिए गुरुवार को पटना में समीक्षा बैठक बुलाई थी। जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा, मंत्री निशांत कुमार, मंत्री श्रवण कुमार, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार और संबंधित जिलों के पार्टी पदाधिकारी शामिल हुए।


बैठक में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस चुनाव में पार्टी के उम्मीदवारों को हार मिली, उसी चुनाव की समीक्षा के दौरान पार्टी के भीतर की नाराजगी खुलकर सामने आ गई। खासतौर पर नीरज कुमार की शिकायत ने ललन सिंह को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया। नीरज कुमार ने अपनी लिखित शिकायत में आरोप लगाया कि ललन सिंह ने जेडीयू के हितों के विपरीत काम किया और जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार को मदद पहुंचाई। यह आरोप इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ललन सिंह जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं और केंद्र सरकार में मंत्री हैं। हालांकि, बैठक में लगाए गए आरोपों पर ललन सिंह का पक्ष सामने आना बाकी है।


नीरज कुमार की शिकायत से यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या जेडीयू के भीतर चुनावी रणनीति को लेकर नेताओं के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है? पार्टी के एकमात्र विजयी उम्मीदवार का इस तरह अपने ही वरिष्ठ नेता के खिलाफ लिखित शिकायत करना सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं माना जा रहा। खासकर तब, जब चुनाव में पार्टी को तीन सीटों पर हार मिली हो और नेतृत्व हार की वजह तलाशने में जुटा हो।


दूसरी तरफ, बैठक में हारने वाले उम्मीदवारों ने भी भाजपा के स्थानीय नेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। तिरहुत स्नातक सीट से चुनाव हारने वाले अभिषेक झा, आनंद पुष्कर और घनश्याम राय ने सहयोगी दलों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने की बात कही। उम्मीदवारों का आरोप था कि भाजपा के स्थानीय नेताओं ने सहयोग का भरोसा तो दिया, लेकिन जमीन पर उनका समर्थन महज दिखावा साबित हुआ। अभिषेक झा ने स्थानीय स्तर पर भीतरघात की शिकायत करते हुए कहा कि कई बूथों पर उन्हें विजयी उम्मीदवार से भी अधिक वोट मिले, लेकिन संगठन के भीतर असहयोग के कारण जीत नहीं मिल सकी।


समीक्षा बैठक में सीटवार चुनावी प्रदर्शन का आकलन किया गया। प्रत्येक सीट के लिए करीब आधे घंटे का समय निर्धारित था। सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक सीट पर हार के कारणों को लेकर विशेष चर्चा हुई। चुनाव प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं की सक्रियता, बूथ प्रबंधन और एनडीए के घटक दलों के बीच तालमेल की कमी जैसे मुद्दे भी उठे।


गौरतलब है कि भाजपा और जेडीयू ने विधान परिषद की आठ सीटों पर चार-चार उम्मीदवार उतारे थे। भाजपा ने तिरहुत शिक्षक और कोसी स्नातक सीट पर जीत हासिल की, जबकि जेडीयू को पटना स्नातक सीट पर सफलता मिली। पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार की जीत इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि अनंत सिंह के विरोध के बावजूद उन्होंने चुनावी मुकाबला अपने नाम किया। इसके उलट तिरहुत स्नातक, दरभंगा शिक्षक और सारण शिक्षक सीट पर जेडीयू को हार झेलनी पड़ी।


बैठक में सामने आए आरोपों के बाद जेडीयू नेतृत्व ने मामले को गंभीरता से लेने के संकेत दिए हैं। कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि उम्मीदवारों और नेताओं ने जो बातें रखी हैं, उनकी समीक्षा की जाएगी और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई भी होगी। वहीं प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने भाजपा-जेडीयू गठबंधन में किसी तरह की दरार की अटकलों को खारिज करते हुए दोनों दलों के रिश्ते को फेविकोल की तरह मजबूत बताया।


हालांकि, इस पूरी कवायद में सबसे बड़ा सवाल ललन सिंह को लेकर उठी शिकायत का है। क्या नीरज कुमार के आरोपों पर पार्टी नेतृत्व कोई कदम उठाएगा या इसे चुनावी हार के बाद नेताओं की आपसी नाराजगी मानकर छोड़ दिया जाएगा? फिलहाल जेडीयू की समीक्षा बैठक ने यह साफ कर दिया है कि विधान परिषद चुनाव की हार का हिसाब केवल वोटों तक सीमित नहीं रहने वाला। पार्टी के भीतर अब सहयोग, संगठन और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका पर भी सवालों का दौर शुरू हो गया है।