पटना: ब्यूरोक्रेसी की दुनिया में अक्सर एक ही वक्त पर कई तस्वीरें सामने आती हैं। कहीं किसी बड़े अधिकारी की संपत्ति और लेन-देन जांच के घेरे में आ जाते हैं, तो कहीं कोई अफसर सरकारी पैसे की एक-एक पाई का हिसाब लेने में जुट जाता है। इन दिनों ऐसी ही दो तस्वीरों की चर्चा हो रही है।
एक तरफ राजस्थान में 40 विला-कॉटेज की खरीद और लीज से जुड़े मामले में IAS-IPS दंपती जांच के दायरे में है। वहीं दूसरी तरफ बिहार में शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव IAS सीके अनिल सरकारी राशि के कथित गबन पर लगातार सख्त कार्रवाई कर रहे हैं।
मामला पूर्वी चंपारण के मोतिहारी का है, जहां शिक्षा विभाग में करीब 60 लाख रुपये की सरकारी राशि के गबन का मामला सामने आया है। दो कर्मचारियों पर निलंबन की कार्रवाई हो चुकी है, जबकि अब तीन अन्य कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में बताई जा रही है।
‘पैसा सरकारी है, हिसाब भी देना होगा’
मोतिहारी में सामने आए गबन के मामले ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भी सक्रिय कर दिया है। मामला सामने आते ही विभागीय स्तर पर फाइलें खंगाली जाने लगीं। कौन-सी राशि कहां गई, किस स्तर पर भुगतान हुआ और आखिर सरकारी खजाने से निकली रकम का हिसाब कहां अटक गया—इन सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं।
इसी बीच शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव सीके अनिल ने मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने मोतिहारी के जिलाधिकारी और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक की।बैठक में साफ संदेश दिया गया कि सरकारी राशि की हेराफेरी को हल्के में नहीं लिया जाएगा। कथित तौर पर गबन की गई करीब 60 लाख रुपये की राशि को दो से तीन दिनों के भीतर वापस वसूलने का अल्टीमेटम दिया गया।यानी मामला सिर्फ फाइलों में जांच तक सीमित नहीं रहने वाला है। रकम की रिकवरी के साथ-साथ जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी तय करने की तैयारी है।
दो कर्मचारी सस्पेंड, तीन और रडार पर
अब तक इस मामले में दो कर्मचारियों को निलंबित किया जा चुका है। लेकिन जांच यहीं रुकती नजर नहीं आ रही। विभाग की नजर तीन अन्य कर्मचारियों पर भी है।जांच एजेंसियां और विभागीय अधिकारी यह पता लगाने में जुटे हैं कि सरकारी राशि की कथित हेराफेरी में केवल दो कर्मचारी शामिल थे या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क भी था।इसी सिलसिले में मुजफ्फरपुर के आरडीडी अधिकारी भी मोतिहारी पहुंचे। उन्होंने घंटों तक संबंधित फाइलों और विभागीय रिकॉर्ड को खंगाला।अब सवाल यही है—60 लाख रुपये की रकम का खेल कैसे हुआ? किसने भुगतान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया? किस स्तर पर लापरवाही हुई? और क्या इसमें किसी बड़े अधिकारी की भूमिका भी थी?इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।
दूसरी तरफ राजस्थान में 40 विला-कॉटेज का मामला
इधर राजस्थान में भी ब्यूरोक्रेसी से जुड़ा एक मामला सुर्खियों में है। 40 विला-कॉटेज की खरीद और लीज से जुड़े मामले में IAS शिखर अग्रवाल पहले ही APO किए जा चुके हैं।अब उनकी पत्नी और 1995 बैच की वरिष्ठ IPS अधिकारी डॉ. प्रशाखा माथुर को भी APO किया गया है। मामले की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी ACB कर रहा है।यहां भी जांच का फोकस संपत्तियों की खरीद और लीज से जुड़े पहलुओं पर है। हालांकि जांच पूरी होने तक किसी भी आरोप को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।यही वजह है कि एक ही समय में ब्यूरोक्रेसी की ये दोनों तस्वीरें चर्चा में हैं—एक तरफ संपत्ति से जुड़ी जांच और दूसरी तरफ सरकारी पैसे की कथित हेराफेरी पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई।
कौन हैं सीके अनिल?
सीके अनिल बिहार कैडर के 1991 बैच के IAS अधिकारी हैं। सैनिक स्कूल तिलैया से पढ़ाई करने वाले सीके अनिल के पास पर्सनल मैनेजमेंट में एमए की डिग्री है।अपने लंबे प्रशासनिक करियर में वे कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। जिला प्रशासन से लेकर सचिव और सलाहकार जैसे पदों पर जिम्मेदारी संभाल चुके सीके अनिल को अब बिहार शिक्षा विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है।शिक्षा विभाग जैसे बड़े और संवेदनशील विभाग में उनकी भूमिका इसलिए भी अहम है, क्योंकि यहां सरकारी योजनाओं, स्कूलों, शिक्षकों और करोड़ों रुपये के बजट से जुड़े काम होते हैं।
मोतिहारी का 60 लाख रुपये का मामला अब सिर्फ एक जिले की विभागीय गड़बड़ी नहीं रह गया है। इसने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि सरकारी पैसे की निगरानी कितनी मजबूत है और गड़बड़ी होने पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?फिलहाल सीके अनिल के एक्शन से इतना जरूर साफ है कि शिक्षा विभाग में सरकारी राशि से जुड़े मामलों पर नजर रखी जा रही है। दो कर्मचारियों के निलंबन के बाद अब तीन अन्य कर्मचारियों की भूमिका की जांच होगी। अगर जांच में और नाम सामने आते हैं, तो कार्रवाई का दायरा बढ़ सकता है।आखिर सरकारी खजाने का पैसा जनता का पैसा है। और इस मामले में विभाग का रुख फिलहाल यही दिखाई दे रहा है—पैसा गया है तो हिसाब भी देना होगा।