पटना: चर्चित आईएएस अधिकारी संजीव हंस से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग और कथित टेंडर घोटाले के मामले में अब जांच एजेंसी की कार्रवाई पर ही हाईकोर्ट ने सवालों की बौछार कर दी है। ठेकेदार रिशुश्री की ओर से दायर अर्जी पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) से एक-दो नहीं, बल्कि 16 अहम बिंदुओं पर जवाब मांगा है।

न्यायमूर्ति सत्यव्रत वर्मा की एकलपीठ के सामने हुई सुनवाई में सबसे बड़ा सवाल यही उभरा कि जिस एफआईआर में रिशुश्री आरोपी तक नहीं थे, उसी मामले को आधार बनाकर उनके घर और कंपनी के दफ्तर पर छापेमारी आखिर किस आधार पर की गई?अदालत के सवालों ने जांच की शुरुआती प्रक्रिया से लेकर बाद में सामने आए सबूत, गिरफ्तारी, रिमांड और निगरानी इकाई के मामलों तक कई कड़ियों को एक साथ जोड़ दिया है।

जिस केस में नाम नहीं, उसी से छापे की शुरुआत क्यों?

रिशुश्री की ओर से अदालत में दलील दी गई कि पूरे मामले की शुरुआत पटना के रूपसपुर थाने में दर्ज एक केस से हुई थी। इस केस में आईएएस अधिकारी संजीव हंस और पूर्व विधायक गुलाब यादव आरोपी बनाए गए थे। याचिका के मुताबिक, रिशुश्री इस एफआईआर में आरोपी नहीं थे।यहीं से हाईकोर्ट का सवाल सामने आया—अगर एफआईआर में रिशुश्री का नाम नहीं था, तो फिर उनके खिलाफ कार्रवाई की शुरुआती वजह क्या थी?

रिशुश्री की ओर से बताया गया कि पटना हाईकोर्ट ने संबंधित एफआईआर को 6 अगस्त 2024 को निरस्त कर दिया था। इससे पहले ही ईडी ने इसी मामले को आधार बनाकर 16 जुलाई 2024 को रिशुश्री के घर और कंपनी के कार्यालय में छापेमारी की थी।छापेमारी के दौरान मोबाइल फोन और बिक्री विलेख यानी सेल डीड समेत कई दस्तावेज जब्त किए जाने की बात याचिका में कही गई है। अब हाईकोर्ट यह जानना चाहता है कि 16 जुलाई की छापेमारी के समय ईडी के पास ऐसा कौन-सा ठोस साक्ष्य था, जिसके आधार पर यह कार्रवाई की गई?

बयान दर्ज हुए, फिर क्या सामने आया?

मामले में रिशुश्री की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि पीएमएलए की धारा 50 के तहत दर्ज किए गए उनके बयानों पर कथित तौर पर जबरन हस्ताक्षर करवाए गए।याचिका के मुताबिक, जांच के दौरान 18 जुलाई, 18 सितंबर, 20 सितंबर, 21 सितंबर और 1 अक्टूबर 2024 को बयान दर्ज किए गए। इन बयानों में बिक्री विलेख और मोबाइल फोन की जब्ती से जुड़ी जानकारी सामने आई।लेकिन अदालत अब यह जानना चाहती है कि इन बयानों में ऐसा क्या मिला, जिसने आगे की जांच की दिशा बदल दी?क्या इन बयानों के बाद किसी नए सरकारी अधिकारी का नाम सामने आया? क्या टेंडर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी को लेकर कोई नई जानकारी मिली? और अगर मिली तो उस पर किस स्तर पर जांच हुई?

265 करोड़ के कथित टेंडर हेरफेर का मामला कैसे जुड़ा?

रिशुश्री की याचिका के अनुसार, ईडी ने पीएमएलए की धारा 66 के तहत मिली जानकारी साझा की। इसके बाद विशेष निगरानी इकाई यानी एसवीयू के स्तर पर मामले दर्ज हुए।याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकारी टेंडर में कथित हेरफेर के जरिए 265.73 करोड़ रुपये के अपराध की बात सामने लाई गई और करीब 68.09 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई।लेकिन हाईकोर्ट के सवालों का केंद्र यही है कि इस पूरी कार्रवाई में रिशुश्री के खिलाफ सामग्री किस चरण में सामने आई? अगर ईडी के पास पहले से ही उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मौजूद थे, तो फिर शुरुआती विजिलेंस केस में उन्हें आरोपी क्यों नहीं बनाया गया?

हाईकोर्ट का सबसे अहम सवाल—पहले सबूत थे या बाद में मिले?

सुनवाई के दौरान अदालत ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। 20 अगस्त 2024 को ईडी की ओर से पीएमएलए की धारा 66 के तहत विजिलेंस को सूचना दी गई और उसके आधार पर एसवीयू केस 05/2024 दर्ज हुआ।लेकिन इसमें रिशुश्री को नामजद नहीं किया गया।इसके बाद 20 सितंबर को अतिरिक्त जानकारी दी गई। वहां भी उनके नाम को लेकर सवाल खड़ा हुआ।अब अदालत जानना चाहती है कि 20 सितंबर 2024 तक ईडी के पास रिशुश्री के खिलाफ कोई सबूत था या नहीं?अगर सबूत था, तो फिर उन्हें विजिलेंस केस में आरोपी बनाने के लिए उस समय कदम क्यों नहीं उठाया गया?और अगर सबूत नहीं था, तो बाद में ऐसा क्या सामने आया जिसके आधार पर जांच आगे बढ़ी?यही सवाल इस मामले की जांच की टाइमलाइन को बेहद महत्वपूर्ण बना देता है।

क्या सिर्फ संजीव हंस की भूमिका थी?

हाईकोर्ट ने मामले का दायरा सिर्फ रिशुश्री तक सीमित नहीं रखा। अदालत ने यह भी पूछा कि कथित टेंडर हेरफेर क्या अकेले किसी एक अधिकारी के स्तर पर संभव था या इसमें अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की भी भूमिका हो सकती है?अदालत ने यह जानना चाहा कि क्या अज्ञात सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच की गई।अगर जांच एजेंसी को टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी का संदेह था, तो क्या दूसरे अधिकारियों के नाम भी सामने आए? क्या उनकी भूमिका की जांच हुई? और अगर नहीं हुई, तो इसकी वजह क्या थी?इन सवालों के जवाब अब ईडी को अपने जवाबी हलफनामे में देने होंगे।

ईसीआईआर को लेकर भी कोर्ट ने उठाया सवाल

सुनवाई में ईसीआईआर को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आए।अदालत ने पूछा कि अगर किसी व्यक्ति का नाम ईसीआईआर की जांच में सामने आता है, तो क्या ईडी उसे सीधे समन कर सकती है या पुलिस की जांच का इंतजार करना होगा?साथ ही अदालत ने यह भी पूछा कि क्या ईसीआईआर की कॉपी उपलब्ध कराए बिना पीएमएलए की धारा 19 के तहत गिरफ्तारी के आधार की रिमांड कोर्ट जांच कर सकती है?एक और सवाल यह रहा कि क्या ईसीआईआर के आधार पर एफआईआर बनती है?इन सवालों का सीधा संबंध ईडी की जांच प्रक्रिया और गिरफ्तारी की वैधानिक प्रक्रिया से है।

2024 से 2025 तक आखिर बदला क्या?

अदालत ने 21 सितंबर, 24 सितंबर और 1 अक्टूबर 2024 को दर्ज बयानों के आधार पर भी स्पष्टीकरण मांगा है। सवाल यह है कि इन बयानों में ऐसा क्या सामने आया, जिसके आधार पर आर्थिक अपराध इकाई (EOU) को सूचना दी गई और बाद में एसवीयू केस 05/2025 दर्ज हुआ?यानी अदालत यह समझना चाहती है कि जांच के किस पड़ाव पर कौन-सा नया तथ्य सामने आया और उसी के आधार पर रिशुश्री के खिलाफ कार्रवाई कैसे आगे बढ़ी।इसके अलावा ईसीआईआर-4 और अतिरिक्त जानकारी में रिशुश्री के खिलाफ मौजूद सामग्री तथा बाद में सप्लीमेंट्री कंप्लेंट 13/2025 में उन्हें आरोपी बनाए जाने के आधार पर भी जवाब मांगा गया है।

अब ईडी को चार हफ्ते में देना होगा जवाब

हाईकोर्ट ने ईडी के संयुक्त निदेशक स्तर के अधिकारी को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को होगी।अब निगाहें इस बात पर हैं कि ईडी अदालत के इन 16 सवालों का क्या जवाब देती है।फिलहाल इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है—जब शुरुआती एफआईआर में रिशुश्री आरोपी नहीं थे, तो उनके घर और कंपनी तक जांच एजेंसी कैसे पहुंची? क्या कार्रवाई के समय ईडी के पास पर्याप्त सबूत थे, या जांच आगे बढ़ने के साथ उनके खिलाफ सामग्री जुटाई गई?इन सवालों का जवाब ईडी के जवाबी हलफनामे से सामने आने की उम्मीद है।