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20-Jan-2026 11:07 AM
By First Bihar
viral video DGP : जिस अफसर के कंधों पर आम जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी हो, जो सिस्टम के “सबसे भरोसेमंद पहरेदारों” में गिना जाता हो—अगर उसी की हरकतें पूरे महकमे की नाक कटवा दें, तो इसे क्या कहा जाए? गलती? फिसलन? या फिर वर्दी की आड़ में बेशर्मी का खुला खेल?
कर्नाटक में डीजीपी (सिविल राइट्स एनफोर्समेंट) के. रामचंद्र राव इन दिनों कानून नहीं, बल्कि लज्जा संहिता के उल्लंघन के आरोपों में घिरे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुए कथित अश्लील वीडियो ने ऐसा भूचाल मचाया कि सरकार को भी कहना पड़ा—बस, बहुत हुआ! और तुरंत निलंबन का डंडा चल गया।
विडंबना देखिए—जिस दफ्तर में संविधान, तिरंगा और पुलिस का प्रतीक चिन्ह होना चाहिए, वहीं कथित तौर पर संयम छुट्टी पर और मर्यादा आउट ऑफ कवरेज दिखी। कहीं वर्दी में “आचरण” डगमगाता दिखा, तो कहीं सूट में “सिस्टम” की साख फिसलती नजर आई।राव साहब का बचाव भी कम दिलचस्प नहीं। वह कहते हैं वीडियो फर्जी हैं, मनगढ़ंत हैं, झूठे हैं—और हां, अगर पुराने हैं तो “आठ साल पुराने”!यानि या तो सब झूठ है, या फिर सच है—लेकिन बहुत पुराना।
ऐसे में एक बड़ी पुरानी कहावत याद आती है। कहावत कुछ इस तरह है कि गलती मेरी नहीं, कैमरे की है—और समय भी गलत है! अब मामला सामने आया तो साहब के तरफ से गृह मंत्री से मिलने की कोशिश हुई, मगर मुलाकात नहीं। बाहर खड़े होकर मीडिया को सफाई दी गई—“मैं हैरान हूं!” अब हकीकत तो यह है कि हैरानी तो जनता को भी है साहब—कि सीसीटीवी की निगरानी में इतनी बड़ी सोच आई तो आई कैसे?
इसके बाद सरकार ने साफ कहा—यह आचरण सरकारी गरिमा के खिलाफ है और All India Services (Conduct) Rules, 1968 की धज्जियां उड़ाने जैसा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का बयान भी दो टूक—दोषी पाए गए तो सख्त कार्रवाई होगी, पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो।
अब मामले में मसाला तब और बढ़ गया जब सामने आया कि राव साहब, सोना तस्करी केस में गिरफ्तार फिल्म अभिनेत्री रान्या राव के सौतेले पिता हैं। आरोप है कि बेटी ने पिता के पद का फायदा उठाया—और अब पिता खुद पद की गरिमा पर सवाल बन गए।
सूत्र बताते हैं कि वीडियो कार्यालय के सीसीटीवी से रिकॉर्ड हुए—यानि कैमरा तो ड्यूटी पर था, लेकिन ड्यूटी की समझ छुट्टी पर। अब सवाल ये नहीं कि वीडियो कब के हैं, सवाल ये है कि सिस्टम कब जागेगा? जब कानून का पहरेदार अगर खुद मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघे, तो अपराधी सिर्फ व्यक्ति नहीं होता, पूरा संस्थान शर्मसार होता है।और तब जनता तंज में नहीं, गुस्से में पूछती है—“साहब, सुरक्षा किससे चाहिए—अपराधियों से या अफसरों की हरकतों से?”