PATNA: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने बिहार सरकार के विकास मॉडल पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में पेश वर्ष 2026 की रिपोर्ट में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), जल संसाधन विभाग के तटबंध निर्माण, शिक्षा विभाग और अन्य सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में घोटाले, बड़े पैमाने पर सरकारी लापरवाही, वित्तीय अनियमितता और निगरानी की विफलता उजागर हुई है।
रिपोर्ट बताती है कि कहीं मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं मिला, कहीं करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद योजनाएं अधूरी रह गईं, कहीं बिना जमीन उपलब्ध हुए टेंडर जारी कर दिए गए तो कहीं काम पूरा किए बिना ही ठेकेदारों को भुगतान कर दिया गया।
बिना किसी योजना के चलती रही मनरेगा की योजना
सीएजी की रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि बिहार में ग्रामीणों को रोजगार देने की योजना मनरेगा के संचालन में की तरह की गड़बड़ियां हुईं. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 से 2024 तक राज्य सरकार के पास ऐसा कोई तंत्र ही नहीं था, जिससे यह पता चल सके कि गांवों में रोजगार की वास्तविक मांग क्या है और समय के साथ उसमें कितना बदलाव आया। ग्राम पंचायत स्तर पर रोजगार की जरूरत का कोई सही आकलन नहीं किया गया। इतना ही नहीं, मनरेगा के लिए चयनित जिलों में 2020-25 की जिला योजना (DPP) भी तैयार नहीं की गई, जिसके कारण मनरेगा को अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ने की योजना भी प्रभावी नहीं बन सकी।
44 प्रतिशत पद खाली, फिर कैसे चलेगी योजना?
मनरेगा के संचालन के लिए स्वीकृत 13,798 पदों में से 6,086 पद खाली पाए गए। यानी लगभग 44 प्रतिशत स्टाफ ही नहीं था। कुछ श्रेणियों में स्थिति और भी खराब रही। कंप्यूटर ऑपरेटरों के 80 प्रतिशत तक पद खाली मिले। रिपोर्ट का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर रिक्तियां रहने से योजना का संचालन बुरी तरह प्रभावित हुआ।
75 प्रतिशत मेट ही नहीं तैनात
राज्य में प्रशिक्षित 1,05,253 मेट में से दिसंबर 2024 तक केवल 26,278 (25 प्रतिशत) को ही तैनात किया गया। नतीजा यह हुआ कि जॉब कार्ड अपडेट नहीं हुए, मजदूरों की उपस्थिति दर्ज करने में गड़बड़ियां मिलीं और काम की मांग का सही रिकॉर्ड भी नहीं रखा गया।
36 करोड़ एडवांस सालों तक पड़ा रहा
रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न एजेंसियों के पास 36.22 करोड़ रुपये पांच वर्षों से अधिक समय तक एडवांस के रूप में पड़े रहे। वहीं मजदूरी और सामग्री भुगतान के लिए 1,903.58 करोड़ रुपये की देनदारियां लंबित थीं, जिनमें 302.24 करोड़ रुपये वर्ष 2019-20 से पहले के थे।
लाखों परिवारों को जॉब कार्ड तक नहीं मिला
सीएजी ने पाया कि राज्य के 1.42 लाख से अधिक पंजीकृत परिवारों को जॉब कार्ड ही जारी नहीं किए गए। इसके अलावा जिन जॉब कार्डों का सत्यापन होना चाहिए था, उनमें भी भारी कमी पाई गई।
मजदूरों को समय पर नहीं मिला पैसा
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019-24 के दौरान मनरेगा के तहत हुए 20,374.91 करोड़ रुपये के भुगतान में से 735.10 करोड़ रुपये का भुगतान 16 दिन से लेकर 90 दिन से अधिक की देरी से किया गया। सबसे गंभीर बात यह रही कि मजदूरी में देरी पर मिलने वाले मुआवजे के अधिकांश दावों को मंजूरी ही नहीं मिली।
63 प्रतिशत काम अधूरे
पांच वर्षों में शुरू किए गए 1.21 करोड़ कार्यों में से केवल 37 प्रतिशत ही पूरे हो सके। बाकी 63 प्रतिशत कार्य नवंबर 2024 तक अधूरे पड़े थे।
सोशल ऑडिट भी सिर्फ कागजों में
रिपोर्ट के अनुसार चयनित जिलों में जितने सामाजिक अंकेक्षण यानि सोशल ऑडिट होने चाहिए थे, उनमें से केवल 25.89 प्रतिशत ही किए गए। यानी योजना की स्वतंत्र निगरानी लगभग ठप रही।
जल संसाधन विभाग में बड़ी गड़बड़ी पकड़ी गई
जल संसाधन विभाग पर भी सीएजी ने गंभीर टिप्पणी की है। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार भूमि उपलब्ध हुए बिना ही कई योजनाओं का टेंडर निकाल दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि 247.80 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद कई योजनाएं शुरू ही नहीं हो सकीं या अधूरी रह गईं।
5.26 लाख लोगों को नहीं मिला बाढ़ सुरक्षा का लाभ
भूमि उपलब्ध नहीं होने के कारण तटबंध निर्माण अधूरा रह गया। नतीजा यह हुआ कि 5.26 लाख लोगों और 17,400 हेक्टेयर कृषि भूमि को बाढ़ सुरक्षा का अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका, जबकि 28.97 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे।
50 हजार लोगों की सुरक्षा अधर में
रातो नदी के किनारे 25.85 किलोमीटर तटबंध अधूरा रहने के कारण 50 हजार लोगों और 6,000 हेक्टेयर भूमि को बाढ़ से सुरक्षा नहीं मिल सकी। इसके बावजूद 6.09 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे।
बिना वजह टेंडर रद्द, सरकार को करोड़ों का नुकसान
सीएजी ने पाया कि विभाग ने सितंबर 2020 में एक टेंडर बिना ठोस कारण रद्द कर दिया। एक साल बाद वही काम ऊंची दर पर कराया गया, जिससे सरकार को 7.15 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ा।
मिट्टी नहीं डाली, फिर भी पूरा भुगतान
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई योजनाओं में केवल मिट्टी की खुदाई हुई, लेकिन उसे तटबंध पर फैलाने का काम नहीं हुआ। इसके बावजूद ठेकेदारों को 6.55 करोड़ रुपये का पूरा भुगतान कर दिया गया।
काम कम, भुगतान ज्यादा
भूमि नहीं मिलने के कारण एक परियोजना का अनुबंध समाप्त कर दिया गया। लेकिन ठेकेदार को 28.97 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया, जबकि वास्तविक कार्य केवल 26.68 करोड़ रुपये का हुआ था। यानी 2.29 करोड़ रुपये अधिक दे दिए गए।
320 करोड़ खर्च, फिर भी तटबंध असुरक्षित
दरभंगा क्षेत्र में बागमती नदी के किनारे 320.85 करोड़ रुपये खर्च किए गए। लेकिन आवश्यक ऊंचाई के अनुरूप तटबंध नहीं बनने से वे अब भी बाढ़ के प्रति संवेदनशील बने हुए हैं। यानि नदी में पानी आय़ा तो लोगों को कोई सुरक्षा नहीं मिल पायेगी.
शिक्षा विभाग भी नहीं बचा
सीएजी ने शिक्षा विभाग की भी खामियां उजागर की हैं। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षा विभाग को 161 भवनों का सेवा शुल्क समय पर नहीं चुकाने से 8.47 करोड़ रुपये अतिरिक्त ब्याज देना पड़ा। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय को 5.37 करोड़ रुपये की वित्तीय हानि हुई। कर्मचारियों के भविष्य निधि अंशदान में देरी के कारण 3.77 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हुए।