Bihar Education News : बिहार में विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) ने समाजशास्त्र विषय में चयनित एक अभ्यर्थी का चयन रद्द कर दिया है। आयोग ने यह कार्रवाई अभ्यर्थी द्वारा प्रस्तुत फर्जी शिक्षण अनुभव प्रमाण पत्र के आधार पर की है। मामले को गंभीर मानते हुए आयोग ने संबंधित विश्वविद्यालय को अभ्यर्थी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश भी दिया है। इस कार्रवाई के बाद विश्वविद्यालय नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रमाण पत्रों की जांच को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।


जानकारी के अनुसार समाजशास्त्र विषय के लिए विज्ञापन संख्या AP-SOCI-17/20-21 के तहत सहायक प्राध्यापक पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी। इसी प्रक्रिया में मनोज कुमार नामक अभ्यर्थी का चयन पिछड़ा वर्ग (BC) कोटे से किया गया था। चयन सूची में उनका नाम नौवें स्थान पर दर्ज था। आयोग की ओर से चयन और आवंटन सूची जनवरी 2025 में प्रकाशित की गई थी, जिसके बाद संबंधित विश्वविद्यालय में नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।


इसी दौरान भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा द्वारा अभ्यर्थी के दस्तावेजों की जांच की गई। विश्वविद्यालय प्रशासन को जांच के दौरान शिक्षण अनुभव प्रमाण पत्र पर संदेह हुआ। जब प्रमाण पत्र की विस्तृत जांच कराई गई तो वह पूरी तरह फर्जी निकला। विश्वविद्यालय ने अपनी रिपोर्ट में आयोग को स्पष्ट रूप से बताया कि अभ्यर्थी द्वारा जमा किया गया अनुभव प्रमाण पत्र सत्यापित नहीं हो सका और दस्तावेज जाली पाया गया है।


फर्जी प्रमाण पत्र की पुष्टि होने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए अभ्यर्थी की नियुक्ति और पदस्थापन को निरस्त कर दिया। साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि नियुक्ति पत्र जारी होने की तिथि से ही उनकी सेवा समाप्त मानी जाएगी। विश्वविद्यालय की इस रिपोर्ट के आधार पर बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने भी चयन को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया।


आयोग ने अपने आदेश में कहा कि चयन सूची में शामिल उक्त अभ्यर्थी की नियुक्ति संबंधी अनुशंसा अब प्रभावी नहीं मानी जाएगी। आयोग ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए संबंधित विश्वविद्यालय को निर्देश दिया है कि अभ्यर्थी के खिलाफ सुसंगत धाराओं में एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाए। आयोग ने साफ किया कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाने की कोशिश करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।


इस पूरे मामले के सामने आने के बाद शिक्षा जगत में भी चर्चा तेज हो गई है। विश्वविद्यालयों और आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में दस्तावेज सत्यापन की भूमिका को अब और महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते जांच नहीं होती तो फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर अभ्यर्थी लंबे समय तक नौकरी करता रहता।


बीएसयूएससी की इस कार्रवाई को नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता कायम रखने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। आयोग ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि किसी भी प्रकार की जालसाजी या फर्जी दस्तावेजों के जरिए सरकारी नौकरी हासिल करने का प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आने वाले समय में आयोग और विश्वविद्यालयों द्वारा प्रमाण पत्रों की जांच और अधिक सख्ती से किए जाने की संभावना जताई जा रही है।