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20-Feb-2026 12:12 PM
By First Bihar
Bihar Assembly : संदीप सौरभ द्वारा बिहार विधानसभा में कार्य स्थगन प्रस्ताव के दौरान उठाए गए मुद्दे ने सदन में तीखी बहस छेड़ दी। उन्होंने कहा कि बिहार समेत देश की कई यूनिवर्सिटियों में जाति आधारित भेदभाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। उनके अनुसार, विश्वविद्यालयों में समानता और गैर-भेदभाव सुनिश्चित करने के लिए University Grants Commission (यूजीसी) द्वारा नियम बनाए गए थे, लेकिन इन नियमों को लागू करने में बाधाएं खड़ी की गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ तथाकथित ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले लोगों के विरोध और धरना-प्रदर्शन के कारण मामला न्यायालय तक पहुंचा और बाद में Supreme Court of India ने उस नियम को स्थगित कर दिया।
सौरभ के वक्तव्य के दौरान सदन में उस समय विवाद की स्थिति बन गई जब उन्होंने “ब्राह्मणवाद” शब्द का इस्तेमाल किया। इस पर विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने हस्तक्षेप करते हुए निर्देश दिया कि कार्यवाही से “ब्राह्मण” शब्द को हटा दिया जाए। अध्यक्ष का कहना था कि सदन की गरिमा बनाए रखना सभी सदस्यों की जिम्मेदारी है और किसी भी समाज विशेष को लक्षित करने वाली शब्दावली से बचना चाहिए।
अध्यक्ष के निर्देश के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। विपक्षी विधायकों ने स्पष्ट किया कि उन्होंने “ब्राह्मण” नहीं बल्कि “ब्राह्मणवाद” शब्द का प्रयोग किया है, जो एक विचारधारा की आलोचना के संदर्भ में था, न कि किसी जाति विशेष के विरुद्ध। वहीं सत्ता पक्ष के विधायकों ने आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसे शब्दों का उपयोग ही अनावश्यक विवाद को जन्म देता है और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करता है। दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक और शोर-शराबा देखने को मिला, जिससे कुछ समय के लिए सदन का माहौल गर्म हो गया।
इसी बीच उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा अपनी सीट से खड़े हुए और सदन को संबोधित करते हुए संयम बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि हम सभी संविधान में विश्वास रखते हैं और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिए जिससे किसी समुदाय की भावना आहत हो या समाज में विभाजन की रेखा गहरी हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि कहीं कोई घटना घटती है तो वह केवल किसी एक वर्ग या समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे राज्य और देश की घटना होती है।
विजय कुमार सिन्हा ने अपने छात्र जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वे तकनीकी कॉलेज में पढ़ने गए थे, तब उनके साथ भी रैगिंग हुई थी और उन्हें हॉस्टल से बाहर निकलने के लिए विवश किया गया था। उन्होंने कहा कि वे स्वयं भूमिहार ब्राह्मण समाज से आते हैं, इसके बावजूद उनके साथ ऐसी घटना घटी। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या किसी जाति विशेष से नहीं, बल्कि गलत मानसिकता से जुड़ी होती है। उन्होंने सदन से अपील की कि मुद्दों को जाति के चश्मे से देखने के बजाय व्यापक सामाजिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाए।
पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट किया कि विधानसभा जैसे लोकतांत्रिक मंच पर भाषा और अभिव्यक्ति की जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामाजिक समानता, संवैधानिक मूल्यों और सदन की गरिमा—इन तीनों के बीच संतुलन बनाए रखना सभी जनप्रतिनिधियों की साझा जिम्मेदारी है।