Bihar Recruitment Scam : बिहार में सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। इस बार मामला बिहार विधान परिषद सचिवालय में हुई नियुक्तियों से जुड़ा है। यहां 125 से अधिक पदों पर की गई बहाली को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हुआ है कि अब नियुक्ति प्रक्रिया से लेकर परीक्षा कराने वाली एजेंसी तक की जांच के दायरे में आ गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस निजी एजेंसी को भर्ती की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उसे पटना हाईकोर्ट पहले ही एक अन्य भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों के बाद तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर चुका है।
मामला सामने आने के बाद बिहार विधान परिषद सचिवालय में हलचल तेज हो गई है। एक तरफ नवनियुक्त अभ्यर्थियों की दक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी तरफ नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जनशिकायतों की संख्या बढ़ने के बाद परिषद प्रशासन ने आंतरिक जांच कमेटी गठित कर दी है। अब नए सिरे से अभ्यर्थियों की योग्यता और कार्यक्षमता की जांच की तैयारी की जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भर्ती प्रक्रिया पूरी करने वाली एजेंसी पहले से ही हाईकोर्ट के आदेश के तहत ब्लैकलिस्टेड थी, तो उसे इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी कैसे सौंप दी गई? क्या नियुक्तियों के दौरान निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन किया गया था? इन सवालों के जवाब अब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
125 से ज्यादा नियुक्तियों पर क्यों उठने लगे सवाल?
दरअसल, बिहार विधान परिषद सचिवालय में अलग-अलग पदों पर नियुक्ति के लिए वर्ष 2023 में विज्ञापन जारी किया गया था। इसके बाद वर्ष 2025 में विज्ञापन संख्या 1/25 और 2/25 के माध्यम से भी भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इन विज्ञापनों के तहत विभिन्न पदों पर अभ्यर्थियों से आवेदन मांगे गए थे।
लंबी प्रक्रिया के बाद वर्ष 2026 में इन नियुक्तियों को अंतिम रूप दिया गया। कई पदों पर सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र भी जारी कर दिए गए। लेकिन नियुक्ति पत्र मिलने के बावजूद बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों का योगदान यानी ज्वाइनिंग नहीं हो सकी।
इसी बीच नियुक्तियों को लेकर लगातार शिकायतें मिलने लगीं। लोगों ने चयन प्रक्रिया और सफल अभ्यर्थियों की दक्षता पर सवाल उठाए। मामला इतना बढ़ा कि इसकी गूंज न्यायालय तक पहुंच गई। पटना हाईकोर्ट में भी इस मामले को लेकर चुनौती दी गई है।
इसके बाद परिषद प्रशासन ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए आंतरिक जांच शुरू कर दी। शुक्रवार को तो नवनियुक्त अभ्यर्थियों के परिषद सचिवालय में प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई। यानी जिन अभ्यर्थियों के हाथों में नियुक्ति पत्र पहुंच चुका था, उनके सामने अब नौकरी पर संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है।
निजी सहायकों की परीक्षा ने बढ़ाई मुश्किल
इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प मोड़ गुरुवार को सामने आया। परिषद प्रशासन ने निजी सहायक यानी पर्सनल असिस्टेंट के सात पदों पर नियुक्त अभ्यर्थियों को शॉर्टहैंड टेस्ट के लिए बुलाया था। इस परीक्षा का उद्देश्य यह जांचना था कि जिन अभ्यर्थियों का चयन किया गया है, क्या वे वास्तव में उस पद के लिए जरूरी कौशल और दक्षता रखते हैं या नहीं। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि बुलाए जाने के बावजूद सातों में से एक भी अभ्यर्थी शॉर्टहैंड टेस्ट में शामिल नहीं हुआ।
इस घटनाक्रम ने नियुक्तियों को लेकर उठ रहे सवालों को और गंभीर बना दिया। आखिर जिन अभ्यर्थियों का चयन निजी सहायक जैसे पद के लिए हुआ है, वे शॉर्टहैंड टेस्ट में शामिल होने से क्यों बचते रहे? क्या उन्हें अपनी दक्षता साबित करने में परेशानी थी या इसके पीछे कोई दूसरी वजह है? फिलहाल इन सवालों का जवाब सामने नहीं आया है।
हालांकि परिषद प्रशासन ने इस मामले में अब सख्त रुख अपनाया है। निजी सहायक के सात, लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) के 10 और डाटा एंट्री ऑपरेटर के 33 पदों पर चयनित अभ्यर्थियों की दक्षता जांच के लिए 18 नवंबर की नई तारीख तय की गई है। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि इस बार निर्धारित परीक्षा में शामिल नहीं होने वाले अभ्यर्थियों की नियुक्ति रद्द की जा सकती है।
18 नवंबर को होगा असली इम्तिहान, नहीं पहुंचे तो जा सकती है नौकरी
परिषद सचिवालय की ओर से तय की गई नई तारीख अब नवनियुक्त अभ्यर्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। 18 नवंबर को होने वाली दक्षता जांच में उन्हें अपनी कार्यक्षमता साबित करनी होगी। इस जांच के दायरे में कुल 50 पदों के अभ्यर्थी आएंगे। इनमें सात निजी सहायक, 10 एलडीसी और 33 डाटा एंट्री ऑपरेटर के पद शामिल हैं।
इस बार परीक्षा में शामिल होना केवल औपचारिकता नहीं होगी, बल्कि नियुक्ति बचाने के लिए जरूरी प्रक्रिया बन गई है। अगर कोई अभ्यर्थी निर्धारित तारीख पर उपस्थित नहीं होता है तो उसकी नियुक्ति रद्द करने की कार्रवाई की जा सकती है।
वहीं, अन्य पदों पर हुई नियुक्तियों को लेकर भी जांच की प्रक्रिया जारी है। इससे पहले आशुलिपिक के 12 पदों और सुरक्षा प्रहरी के 56 पदों सहित विभिन्न पदों पर नियुक्तियां की गई थीं। हालांकि इन चयनित अभ्यर्थियों का योगदान अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है। यानी नियुक्ति पत्र जारी होने के बावजूद इन अभ्यर्थियों की नौकरी फिलहाल पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।
जिस एजेंसी ने कराई परीक्षा, वही हाईकोर्ट की कार्रवाई के घेरे में
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर पहलू परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसी से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, बिहार विधान परिषद की नियुक्ति प्रक्रिया की जिम्मेदारी सीएस डाटा मेशन रिसर्च सर्विस प्राइवेट लिमिटेड को दी गई थी। इसी एजेंसी ने भर्ती प्रक्रिया का संचालन किया था।
लेकिन अब यही एजेंसी सवालों के घेरे में है। बताया जा रहा है कि इस कंपनी ने पटना हाईकोर्ट में नियमित मजदूरों की भर्ती से जुड़ी परीक्षा प्रक्रिया भी संचालित की थी। उस भर्ती में गड़बड़ी पाए जाने के बाद पटना हाईकोर्ट ने एजेंसी को अगले तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया था। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि जिस एजेंसी पर हाईकोर्ट की ओर से कार्रवाई की जा चुकी थी, उसे बिहार विधान परिषद जैसी संवैधानिक संस्था की भर्ती प्रक्रिया की जिम्मेदारी किस आधार पर दी गई?
क्या एजेंसी की पृष्ठभूमि की जांच नहीं की गई थी? क्या उसे काम सौंपने से पहले उसकी पात्रता और रिकॉर्ड का सत्यापन हुआ था? या फिर ब्लैकलिस्ट किए जाने से पहले ही उसे नियुक्ति प्रक्रिया का जिम्मा मिल चुका था? इन पहलुओं पर भी अब चर्चा तेज हो गई है।हालांकि एजेंसी को लेकर सामने आई जानकारी और विधान परिषद की नियुक्तियों में किसी गड़बड़ी के बीच सीधा संबंध साबित होना अभी बाकी है। इसकी वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
पूर्व सभापति के कार्यकाल में हुई नियुक्तियां, अब मांगा जा रहा जवाब
बताया जा रहा है कि ये नियुक्तियां पूर्व सभापति अवधेश नारायण सिंह के कार्यकाल के दौरान हुई थीं। नियुक्ति पत्र भी उसी दौरान जारी किए गए थे। इस बीच सभापति पद की जिम्मेदारी जेडीयू कोटे के विधान पार्षद को सौंपे जाने की स्थिति स्पष्ट होने के बाद नियुक्ति पत्र जल्दबाजी में जारी किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।मामले पर पूर्व सभापति अवधेश नारायण सिंह से संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि फिलहाल वह पटना से बाहर हैं। वापस लौटने के बाद वह इस पूरे मामले पर सार्वजनिक रूप से विस्तार से अपना पक्ष रखेंगे।वहीं, विधान परिषद के सचिव शिवगोपाल मिश्र ने इस विषय पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने इस संबंध में परिषद कार्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी से बात करने की सलाह दी।
कार्यकारी सभापति ने महाधिवक्ता से लिया कानूनी परामर्श
नियुक्तियों को लेकर बढ़ते विवाद के बीच शुक्रवार शाम विधान परिषद के कार्यकारी सभापति ने राज्य के महाधिवक्ता से भी कानूनी सलाह ली। इससे साफ है कि परिषद प्रशासन अब इस मामले में कोई भी फैसला लेने से पहले कानूनी पहलुओं को गंभीरता से परख रहा है।
एक तरफ हाईकोर्ट में मामला पहुंच चुका है, दूसरी तरफ परिषद को बड़ी संख्या में शिकायतें मिल रही हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता और नियमों के पालन को लेकर उठे सवालों का जवाब कैसे दिया जाए।
अभ्यर्थियों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल- नौकरी बचेगी या जाएगी?
बिहार विधान परिषद भर्ती विवाद ने उन अभ्यर्थियों की चिंता बढ़ा दी है, जिन्हें नियुक्ति पत्र मिल चुका है। कई उम्मीदवार लंबे इंतजार के बाद नौकरी मिलने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन अब उन्हें दोबारा अपनी योग्यता साबित करने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, जिन अभ्यर्थियों का योगदान अभी तक नहीं हुआ है, उनके लिए भी स्थिति अनिश्चित बनी हुई है।
अब सबकी नजर 18 नवंबर को होने वाली दक्षता जांच और आंतरिक कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी है। जांच में क्या सामने आता है, क्या नियुक्तियों को हरी झंडी मिलेगी या फिर चयन प्रक्रिया में बदलाव और रद्द करने जैसी कार्रवाई होगी, यह आने वाला वक्त बताएगा।
फिलहाल बिहार विधान परिषद की 125 से अधिक नियुक्तियों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है- क्या सरकारी नौकरी में चयन केवल नियुक्ति पत्र जारी होने तक सीमित है या अभ्यर्थियों की वास्तविक योग्यता और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता की भी जवाबदेही तय होगी? यही सवाल अब इस पूरे विवाद के केंद्र में है।