Bihar Artists Award :  नई दिल्ली में बिहार की कला और संस्कृति के लिए गुरुवार का दिन बेहद गौरवपूर्ण रहा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने वर्ष 2024 और 2025 के लिए संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और पुरस्कार प्रदान किए। देशभर के 108 कलाकारों को सम्मानित किया गया, जिनमें बिहार के तीन वरिष्ठ कलाकार भी शामिल रहे। इन कलाकारों ने करीब चार से पांच दशक तक रंगमंच और लोक संगीत की सेवा कर अपनी अलग पहचान बनाई है।

राष्ट्रपति ने बिहार के चर्चित अभिनेता-निर्देशक सुरेश कुमार हज्जू, मैथिली रंगमंच के वरिष्ठ निर्देशक शिव नारायण झा उर्फ कुणाल और लोक वाद्य कलाकार महेन्द्र राम को सम्मानित किया। तीनों कलाकारों को ताम्रपत्र, प्रशस्ति पत्र और एक-एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की गई।

मैथिली रंगमंच को नई पहचान देने वाले शिव नारायण झा

शिव नारायण झा उर्फ कुणाल मैथिली रंगमंच के वरिष्ठतम रंगकर्मियों में शामिल हैं। उन्होंने मैथिली नाटकों में प्रयोग और नई नाट्य शैली को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। खास तौर पर कीर्तनियां शैली को लोकप्रिय बनाने में उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है। दशकों तक रंगमंच से जुड़े रहकर उन्होंने मैथिली संस्कृति और नाट्य परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया।

अभिनेता और निर्देशक दोनों रूपों में पहचान

पटना के सुरेश कुमार हज्जू ने अभिनय और निर्देशन दोनों क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे विशाल नाट्य मंच, निर्माण कला मंच और एचएमटी, पटना से जुड़े रहे हैं और इनके संस्थापकों में भी उनकी भूमिका रही है। ‘बिदेसिया’ के बटोही से लेकर ‘बकरी’ के दुर्जन सिंह और महात्मा गांधी जैसे किरदारों को उन्होंने मंच पर प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया। गांधी की भूमिका ने उन्हें खास पहचान दिलाई। लंबे रंगमंचीय सफर में उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन के क्षेत्र में भी लगातार काम किया।

55 वर्षों से ‘रसनचौकी’ साध रहे महेन्द्र राम

मिथिला की पारंपरिक संगीत शैली ‘रसनचौकी’ को देशभर में पहचान दिलाने वाले महेन्द्र राम को भी राष्ट्रपति ने सम्मानित किया। मधुबनी जिले के रहने वाले महेन्द्र राम करीब 55 वर्षों से रसनचौकी वादन कर रहे हैं। वे इस लोकशैली के कारा और सुरवादक कलाकार तथा गुरु के रूप में जाने जाते हैं।

उनका जीवन लोक संगीत की उस परंपरा को समर्पित रहा है, जो पीढ़ियों से मिथिला की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रही है। इतने लंबे समय तक इस परंपरा को जीवित रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है।

जब राष्ट्रपति ने हज्जू से पूछा- ‘आप ही गांधी बनते हैं न?’

पुरस्कार समारोह के दौरान बिहार के लिए सबसे यादगार क्षण तब आया, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सुरेश हज्जू को सम्मानित करते हुए उनसे पूछा, ‘आप ही गांधी बनते हैं न?’ हज्जू ने जब हां में जवाब दिया तो राष्ट्रपति ने केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत से भी उनका परिचय कराया।

हज्जू ने जब राष्ट्रपति से पूछा कि उन्हें उनके बारे में कैसे पता है, तो मुर्मु मुस्कुराईं और कहा कि उन्होंने उनका वीडियो देखा है। राष्ट्रपति की इस प्रतिक्रिया से हज्जू भावुक और उत्साहित नजर आए। बाद में उन्होंने कहा कि इस सम्मान के बाद वह अपने काम को और अधिक संजीदगी के साथ आगे बढ़ाएंगे।

बिहार के इन तीन कलाकारों का सम्मान सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि राज्य की समृद्ध रंगमंचीय और लोक सांस्कृतिक परंपराओं का भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है। दशकों की साधना के बाद मिले इस पुरस्कार ने बिहार की कला प्रतिभाओं को देश के सामने एक बार फिर मजबूती से स्थापित किया है।