Bihar Sand Mining Rules: बिहार में बालू खनन शुरू होते ही नियम भी सख्त हो गए हैं। राज्य के 212 बालू घाटों पर 16 अक्टूबर से खनन और बालू उठाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसके साथ ही सरकार ने घाटों की निगरानी और पर्यावरणीय नियमों के पालन को लेकर बंदोबस्तधारियों पर शिकंजा कस दिया है। अब बालू घाट पर छोटी सी लापरवाही भी जेब पर भारी पड़ सकती है। नियम तोड़ने पर न्यूनतम 1 लाख रुपये से लेकर अधिकतम 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।


सरकार का फोकस सिर्फ बालू निकालने तक सीमित नहीं है। घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था, सीमांकन, धूल रोकने के इंतजाम, रोशनी, रिकॉर्ड रखने और पर्यावरण संरक्षण जैसे नियमों का पालन भी अनिवार्य किया गया है। खास बात यह है कि खनन योजना में जितने पेड़ लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, अगर उतने पौधे नहीं लगाए गए तो इसके लिए भी बंदोबस्तधारी को जुर्माना भरना पड़ेगा।


दरअसल, बालू घाटों के संचालन से जुड़े इन प्रावधानों को बिहार गजट में 6 मई 2026 को प्रकाशित किया गया था। अब नए खनन सत्र में इन नियमों को सख्ती से लागू किया जा रहा है। जिला प्रशासन और खनन विभाग की ओर से घाटों की निगरानी की जा रही है। नियमों का उल्लंघन मिलने पर समाहर्ता यानी जिलाधिकारी संबंधित पट्टाधारी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई कर सकते हैं।


घाट पर सबसे पहले जरूरी है कि वहां स्पष्ट और निर्धारित मानकों के अनुसार साइन बोर्ड लगा हो। अगर बंदोबस्तधारी ने घाट पर साइन बोर्ड नहीं लगाया तो उस पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। इसी तरह घाट की निर्धारित सीमा को चिह्नित नहीं करने पर 5 लाख रुपये तक का दंड देना पड़ सकता है।


बालू उठाव के दौरान धूल उड़ना आम बात है, लेकिन अब इसे रोकने की जिम्मेदारी भी घाट संचालक की होगी। धूल नियंत्रण के लिए नियमित रूप से पानी का छिड़काव नहीं करने पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। घाट पर पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था नहीं रखना भी महंगा पड़ेगा। इसके लिए भी 1 लाख रुपये तक का दंड निर्धारित किया गया है।


सरकार ने बालू खनन के पूरे कारोबार का हिसाब-किताब रखने को भी अनिवार्य किया है। कितना बालू निकाला गया, कितना उठाव हुआ और कितनी ढुलाई हुई, इसका रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से रखना होगा। इस रिकॉर्ड में गड़बड़ी या इसे बनाए रखने में लापरवाही सामने आने पर कार्रवाई हो सकती है। बालू खनन और ढुलाई का हिसाब नहीं रखने पर 10 लाख रुपये तक का सबसे बड़ा जुर्माना लगाया जा सकता है।


इसके अलावा बंदोबस्तधारियों को विभागीय पोर्टल पर निर्धारित समय सीमा के भीतर मासिक रिटर्न अपलोड करना भी जरूरी होगा। हर महीने की गतिविधियों से संबंधित जानकारी समय पर पोर्टल पर दर्ज नहीं करने पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। यानी अब घाट पर सिर्फ खनन करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऑनलाइन रिकॉर्ड और दस्तावेजों को भी अपडेट रखना पड़ेगा।


पर्यावरण को लेकर भी नियम काफी सख्त किए गए हैं। खनन योजना के तहत जिन स्थानों पर पेड़ लगाने का प्रावधान है, वहां पौधरोपण करना अनिवार्य होगा। अगर 50 पेड़ तक की कमी पाई जाती है तो 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। वहीं, 50 से ज्यादा पेड़ों की कमी होने पर 5 लाख रुपये के अतिरिक्त प्रत्येक पेड़ के लिए 2 हजार रुपये का दंड देना होगा।


इसका सीधा मतलब है कि बालू घाटों पर अब सिर्फ उत्पादन और बिक्री पर नजर नहीं होगी, बल्कि खनन के पूरे संचालन की निगरानी की जाएगी। प्रशासन यह देखेगा कि घाट की सीमा तय है या नहीं, सुरक्षा इंतजाम पर्याप्त हैं या नहीं, धूल नियंत्रण के लिए पानी का छिड़काव हो रहा है या नहीं और पर्यावरणीय शर्तों का पालन किया जा रहा है या नहीं।


राज्य में बालू की मांग को देखते हुए 16 अक्टूबर से 212 घाटों पर खनन शुरू होने के बाद गतिविधियां बढ़ी हैं। ऐसे में सरकार की कोशिश है कि बालू खनन निर्धारित नियमों और पर्यावरणीय मानकों के दायरे में हो। बंदोबस्तधारियों के लिए संदेश साफ है—बालू निकालिए, लेकिन नियमों को नजरअंदाज करना अब भारी पड़ेगा। एक छोटी लापरवाही पर लाखों रुपये का जुर्माना जेब ढीली कर सकता है।