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Bihar Rajya Sabha Election : राज्यसभा की पांचवीं सीट पर सियासी शतरंज, क्या तेजस्वी दिखा पाएंगे दम या नीतीश -सम्राट इस मैदान में भी कर देंगे परास्त

बिहार में राज्यसभा की पांचवीं सीट को लेकर सियासी घमासान तेज। तेजस्वी यादव के नेतृत्व और महागठबंधन की एकजुटता की पहली बड़ी परीक्षा।

Bihar Rajya Sabha Election : राज्यसभा की पांचवीं सीट पर सियासी शतरंज, क्या तेजस्वी दिखा पाएंगे दम या नीतीश -सम्राट इस मैदान में भी कर देंगे परास्त

22-Feb-2026 08:09 AM

By First Bihar

Bihar Rajya Sabha Election : बिहार की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा की पांच रिक्त सीटों के चुनाव ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल खड़ा कर दिया है। खास तौर पर राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष बने तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव नेतृत्व की पहली बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।


पृष्ठभूमि और राजनीतिक संदर्भ

राजद नेता तेजस्वी यादव की सक्रियता इस बार स्पष्ट रूप से बढ़ी हुई है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पांचवीं सीट की लड़ाई महज एक संसदीय सीट की नहीं, बल्कि महागठबंधन की एकजुटता और विपक्ष की साख की भी है।


विधानसभा के वर्तमान आंकड़ों के अनुसार सत्ताधारी गठबंधन एनडीए को चार सीटों पर कोई खास चुनौती नहीं है। एनडीए के घटक दलों में भाजपा के 89, जदयू के 85, लोजपा के 19, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के 5 और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के 4 विधायक हैं। वहीं महागठबंधन में राजद के 25, कांग्रेस के 6, माले के 2, माकपा के 1 और इंडियन इंक्लूसिव पार्टी के 1 विधायक हैं। अन्य दलों में एआईएमआईएम के 5 और बसपा का 1 विधायक है।


तेजस्वी के लिए अग्निपरीक्षा

तेजस्वी यादव अब राजद के कार्यकारी अध्यक्ष हैं। इस भूमिका में यह उनका पहला बड़ा राजनीतिक इम्तिहान है। अगर वे पांचवीं सीट पर मुकाबला खड़ा करने में सफल रहते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि वे गठबंधन राजनीति को साधने में सक्षम हैं। लेकिन अगर रणनीति विफल होती है, तो नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठ सकते हैं।


राजद की कोशिश है कि एआईएमआईएम और बसपा को साधकर समीकरण अपने पक्ष में किया जाए। हालांकि, एआईएमआईएम ने साफ संकेत दिया है कि वह “मोहरा” नहीं बल्कि “खिलाड़ी” की भूमिका चाहती है। इसका मतलब है कि वह अपने प्रत्याशी के समर्थन की शर्त रख सकती है। यह स्थिति राजद के लिए दुविधापूर्ण है, क्योंकि कांग्रेस और अन्य घटकों को साथ लेकर चलना भी जरूरी है।


कांग्रेस का रुख और अंतर्विरोध

पिछले राज्यसभा चुनाव में राजद ने कांग्रेस को समर्थन दिया था। अब कांग्रेस से प्रतिदान की अपेक्षा जताई जा रही है। लेकिन राज्यसभा चुनाव में व्हिप जारी नहीं होता, जिससे क्रॉस वोटिंग की संभावना बनी रहती है। कांग्रेस के बदले हुए तेवरों से राजद पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।


वामदलों के समर्थन को लेकर राजद अपेक्षाकृत निश्चिंत दिखता है, लेकिन गठबंधन की अंदरूनी एकजुटता पर पूरी गारंटी कोई नहीं दे सकता। बिहार में गठबंधन राजनीति का इतिहास स्थायित्व की बजाय अवसरवादिता से अधिक जुड़ा रहा है।


पांचवीं सीट की असली गणित

पांचवीं सीट पर एनडीए को प्रथम वरीयता के अतिरिक्त तीन वोटों की जरूरत है। महागठबंधन अगर अपने सभी 35 विधायकों को एकजुट भी रख ले, तब भी उसे छह अतिरिक्त वोट जुटाने होंगे। ऐसे में एआईएमआईएम के पांच और बसपा के एक विधायक निर्णायक साबित हो सकते हैं।


लेकिन बसपा का अब तक का रुख सत्ता पक्ष के साथ रहने का रहा है। वहीं एआईएमआईएम की शर्तें राजद के लिए आत्मघाती साबित हो सकती हैं। अगर एआईएमआईएम को आगे बढ़ाया जाता है, तो मुस्लिम नेतृत्व के सवाल पर राजद की परंपरागत पकड़ कमजोर पड़ सकती है।


एनडीए की रणनीतिक बढ़त

एनडीए फिलहाल संख्या बल के आधार पर मजबूत स्थिति में है। जदयू के हरिवंश नारायण सिंह और रामनाथ ठाकुर, रालोमो के उपेंद्र कुशवाहा तथा राजद के प्रेमचंद गुप्ता और एडी सिंह की सीटें रिक्त हो रही हैं। चार सीटों पर एनडीए का दावा लगभग तय माना जा रहा है।विपक्ष की रणनीति मुख्य रूप से एनडीए की एकतरफा जीत में व्यवधान डालने पर केंद्रित है। छोटे घटक दलों में महत्वाकांक्षा और असंतोष को भुनाने की कोशिश की जा रही है।


गुणा-गणित 

राज्यसभा की एक सीट के लिए प्रथम वरीयता के 41 वोट चाहिए। एनडीए के 202 और महागठबंधन के 35 विधायक हैं। एनडीए में भाजपा-जदयू की दो-दो सीटें तय मानी जा रहीं। पांचवीं सीट किसी तीसरे घटक दल को मिलेगी।


एनडीए में पांच दल हैं। ऐसे में दो दलों की नाराजगी की चर्चा इसलिए बेमानी है, क्योंकि मंत्रिपरिषद में उन्हें पूर्ण सहभागिता मिली हुई है और आगे विधान परिषद के लिए बड़ी आशा है। महागठबंधन के साथ ऐसी कोई संभावना नहीं।

राजनीतिक संदेश और भविष्य

यह चुनाव सिर्फ राज्यसभा की सीटों का गणित नहीं, बल्कि 2026-27 की संभावित राजनीतिक लड़ाई की भूमिका भी तय करेगा। अगर तेजस्वी यादव इस चुनौती को अवसर में बदलते हैं, तो वे खुद को महागठबंधन के निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित कर सकते हैं। दूसरी ओर, यदि पांचवीं सीट पर विपक्ष की रणनीति विफल रहती है, तो यह संदेश जाएगा कि एनडीए की पकड़ अभी भी मजबूत है और विपक्ष बिखरा हुआ है।


स्पष्ट है कि 16 मार्च का राज्यसभा चुनाव बिहार की राजनीति में नई रेखाएं खींच सकता है। यह चुनाव तेजस्वी यादव की राजनीतिक परिपक्वता, गठबंधन कौशल और रणनीतिक क्षमता की असली परीक्षा साबित होने वाला है।