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15-Mar-2026 01:02 PM
By First Bihar
BIHAR NEWS : बिहार की राजनीति इन दिनों बेहद गरमाई हुई है। 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव ने राज्य के सियासी माहौल को पूरी तरह से चुनावी रंग में रंग दिया है। पाँच सीटों के लिए होने वाला यह चुनाव अब सिर्फ एक संसदीय प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच प्रतिष्ठा की जंग बन चुका है। सियासी गलियारों में लगातार बैठकों, रणनीतियों और जोड़-तोड़ की खबरें सामने आ रही हैं।
वर्तमान फोर्मुले से राज्यसभा चुनाव को देखें तो बिहार में खाली सीटों की संख्या 5 हैं और कैंडिडेट की संख्या 6 हैं और विधानसभा सीटों की संख्या 243 हैं। ऐसे में यदि 243 सीटों को 5 सीटों को बंटाना है तो सीटों की संख्या में एक बढाकर भाग दिया जाएगा ऐसे में यदि 243 को 6 से भाग करते हैं तो कुल संख्या आती है 40.5 यानी लगभग एक सीट के लिए 41 विधायक और वर्तमान समय में एनडीए के पास कुल विधायकों की संख्या है 202 तो 4 सीटों पर जीत पक्की है और रही बात पांचवी सीट की तो इसके लिए एनडीए को 3 विधायकों का जुगाड़ करना है जो प्रथम वरीयता में एनडीए के कैंडिडेट को रखें तो खेल यहीं से शुरू हो रहा है।
इधर, इस सीट के लिए महागठबंधन और एनडीए के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। दोनों पक्ष अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए लगातार रणनीति बना रहे हैं। यही वजह है कि इस बार छोटे दलों के विधायकों की अहमियत अचानक बढ़ गई है। सियासी समीकरण इस कदर उलझ गए हैं कि अब छोटे दलों के विधायक ‘किंगमेकर’ की भूमिका में नजर आ रहे हैं।
खासतौर पर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के पाँच विधायक और बहुजन समाज पार्टी का एकमात्र विधायक इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। कुल मिलाकर इन छह वोटों की अहमियत इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि दोनों राजनीतिक खेमों की निगाहें इन्हीं पर टिकी हुई हैं। राजनीतिक दल लगातार संपर्क साधने और समर्थन हासिल करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।
दरअसल, विधानसभा या लोकसभा चुनाव में जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वही विजेता घोषित होता है। लेकिन राज्यसभा चुनाव में एकल संक्रमणीय आनुपातिक मतदान प्रणाली लागू होती है, जो इसे सामान्य चुनावों से अलग बनाती है। इस प्रणाली में विधायक केवल एक उम्मीदवार को वोट नहीं देते, बल्कि कई उम्मीदवारों को अपनी पसंद के अनुसार क्रमवार वरीयता देते हैं।
मतदान के दौरान विधायक बैलेट पेपर पर अपने पसंदीदा उम्मीदवार के सामने रोमन अंक में “1” लिखते हैं, जो उनकी पहली पसंद मानी जाती है। इसके बाद वे दूसरी पसंद के लिए “2”, तीसरी पसंद के लिए “3” और इसी तरह आगे की वरीयता अंकित कर सकते हैं। मतगणना के समय सबसे पहले पहली वरीयता के वोटों की गिनती होती है।
किसी उम्मीदवार को जीतने के लिए कुल वैध मतों के 50 प्रतिशत से एक अधिक वोट हासिल करना जरूरी होता है। अगर कोई भी उम्मीदवार इस आंकड़े तक नहीं पहुंचता, तो सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को बाहर कर दिया जाता है। इसके बाद उस उम्मीदवार के बैलेट पेपर पर दर्ज दूसरी वरीयता के वोट अन्य उम्मीदवारों में ट्रांसफर कर दिए जाते हैं। इसी प्रक्रिया के जरिए अंततः विजेता तय किया जाता है।
यही कारण है कि इस बार बिहार का राज्यसभा चुनाव बेहद दिलचस्प बन गया है। पहली पसंद के वोटों के साथ-साथ दूसरी और तीसरी पसंद के वोट भी बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं। कई बार ऐसा होता है कि पहली वरीयता में पीछे रहने वाला उम्मीदवार दूसरी वरीयता के वोटों के जरिए आगे निकल जाता है।
ऐसे में सभी दल अपने विधायकों को पूरी रणनीति के साथ मतदान कराने की तैयारी कर रहे हैं। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि अगर छोटे दलों के विधायक किसी एक पक्ष के साथ मजबूती से खड़े हो जाते हैं, तो पाँचवीं सीट का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है।
अब सबकी नजर 16 मार्च को होने वाले मतदान और उसके बाद आने वाले नतीजों पर टिकी हुई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या एनडीए पाँचवीं सीट पर भी कब्जा जमा पाएगा या महागठबंधन आखिरी समय में सियासी बाज़ी पलटकर बड़ा उलटफेर कर देगा। बिहार की सियासत का यह मुकाबला आने वाले दिनों में कई नए राजनीतिक संकेत भी दे सकता है।