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06-Mar-2026 10:09 AM
By First Bihar
Bihar politics : बिहार की राजनीति इन दिनों राज्यसभा चुनाव को लेकर बेहद गर्म हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। चार सीटों पर जहां उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है, वहीं पांचवीं सीट ने पूरे सियासी समीकरण को उलझा दिया है। इस सीट को लेकर अब सियासी शतरंज बिछ चुकी है और छह विधायकों की भूमिका अचानक बेहद अहम हो गई है।
दरअसल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन, जदयू के वरिष्ठ नेता रामनाथ ठाकुर और दलित नेता शिवेश कुमार राम ने राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। विधानसभा के मौजूदा गणित को देखते हुए इन चारों नेताओं के निर्विरोध निर्वाचित होने की संभावना लगभग तय मानी जा रही है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में इन चार सीटों को लेकर ज्यादा सस्पेंस नहीं है।
लेकिन असली मुकाबला पांचवीं सीट को लेकर है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने इस सीट के लिए उपेंद्र कुशवाहा को मैदान में उतारा है, जबकि महागठबंधन की ओर से अमरेंद्रधारी सिंह उम्मीदवार हैं। दोनों ही उम्मीदवारों के लिए जीत की राह आसान नहीं दिख रही, क्योंकि विधानसभा का संख्याबल किसी एक पक्ष को साफ बढ़त नहीं दे रहा।
अगर विधानसभा के गणित पर नजर डालें तो भाजपा और जदयू के पास मौजूद विधायकों की संख्या चार उम्मीदवारों को जिताने में ही लगभग पूरी तरह खर्च हो जाएगी। ऐसे में अगर एनडीए को उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजना है तो उसे कम से कम तीन अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। वहीं दूसरी ओर महागठबंधन के उम्मीदवार अमरेंद्रधारी सिंह को जीत के लिए छह अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। यही वजह है कि अब नजरें उन विधायकों पर टिक गई हैं जो फिलहाल किसी भी बड़े गठबंधन के साथ खुलकर खड़े नहीं दिख रहे हैं।
बिहार विधानसभा में ऐसे छह विधायक हैं जिनकी भूमिका इस चुनाव में निर्णायक मानी जा रही है। इनमें सबसे प्रमुख नाम असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान का है, जो पूर्णिया जिले की अमौर सीट से विधायक हैं। उनके अलावा एआईएमआईएम के ही मुर्शीद आलम (जोकीहाट), मो. तौसीफ आलम (बहादुरगंज), सरवर आलम और गुलाम सरवर भी इस समीकरण में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
इनके अलावा मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी के बिहार में इकलौते विधायक सतीश कुमार यादव का नाम भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कैमूर जिले की चैनपुर सीट से विधायक सतीश यादव इस वक्त दोनों खेमों के लिए बेहद अहम बन गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इन विधायकों का समर्थन किसी एक पक्ष को मिल जाता है तो पांचवीं सीट का पूरा गणित बदल सकता है।
इसी वजह से राज्यसभा की इस सीट को लेकर पर्दे के पीछे राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। दोनों गठबंधन इन विधायकों को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। हालांकि अभी तक इन विधायकों की ओर से खुलकर किसी पक्ष का समर्थन करने की घोषणा नहीं की गई है, जिससे सस्पेंस और भी बढ़ गया है।
कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में इस वक्त राज्यसभा की पांचवीं सीट सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन गई है। यह सीट न केवल विधानसभा के गणित की परीक्षा ले रही है बल्कि छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की ताकत को भी सामने ला रही है। अब सबकी नजरें उन्हीं छह विधायकों पर टिकी हैं, क्योंकि उनकी एक चाल तय करेगी कि दिल्ली की संसद में इस बार एनडीए के उपेंद्र कुशवाहा पहुंचेंगे या महागठबंधन के अमरेंद्रधारी सिंह। फिलहाल बिहार की सियासत में यही सबसे बड़ा सस्पेंस बना हुआ है।