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08-Jan-2026 03:09 PM
By First Bihar
Bihar mutation case : बिहार सरकार के अंतर्गत आने वाला विभाग राजस्व एवं भूमि सुधार काफी सुर्खियों में बना हुआ है। इस विभाग के मंत्री लगातार अधिकारियों को टास्क देने में लगे हुए हैं। लेकिन मंत्री जी डाल -डाल हैं तो अधिकारी पात -पात चल रहे हैं। अब जहां मंत्री जी अधिकारियों की अवैध वसूली को रोकने के लिए सख्त फरमान जारी कर रहे हैं तो अधिकारी नए तरकीब से नजराना वसूलने का तरीका खोज लिया है। आइए जानते हैं कि पूरी खबर क्या है ?
बिहार में उपमुख्यमंत्री और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय सिन्हा की सख्ती के बाद राज्य के राजस्व विभाग में रैयतों पर नए तरह के दबाव और परेशानियों की घटनाएँ सामने आ रही हैं। राजस्व कर्मचारी से लेकर अंचल अधिकारी स्तर तक, कई मामलों में दाखिल-खारिज (Mutation) के आवेदन पर रैयतों से अनुचित वसूली की कोशिश की जा रही है। अधिकारियों द्वारा बिना किसी वैध आपत्ति के आवेदन को आब्जेक्टेड केस दर्ज कर दिया जाता है, जिससे रैयतों पर अतिरिक्त दबाव और वित्तीय बोझ पैदा हो रहा है।
राजस्व प्रक्रिया के अनुसार, दाखिल-खारिज के लिए आवेदन की तिथि से 21 से 35 दिनों के भीतर इसका निपटारा करना अनिवार्य है। यदि आवेदन पर किसी प्रकार की आपत्ति दर्ज होती है, तो निपटारे की अवधि बढ़कर 63 से 75 दिनों तक हो जाती है। लेकिन वर्तमान में कई मामलों में जानबूझकर आपत्ति दर्ज कर दी जाती है, जिससे आवेदन की प्रक्रिया लंबित हो जाती है और रैयतों को अत्यधिक इंतजार करना पड़ता है।
अधिकारी इस प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रैयतों से अतिरिक्त राशि वसूलने की नई तरकीब निकाल रहे हैं। उदाहरण के लिए, कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां किसी आवेदन पर कोई वैध आपत्ति नहीं होने के बावजूद इसे आब्जेक्टेड केस में डाल दिया गया। इसके बाद रैयतों को आपत्ति का नोटिस भेजा जाता है, जो उन्हें मानसिक और वित्तीय रूप से परेशान करता है।
इस तरह की शिकायतें राज्य के विभिन्न हिस्सों से लगातार मिल रही हैं। औराई के मोहन साह ने डीएम को आवेदन देकर शिकायत की है कि उनके इलाके में एक आदेश में दाखिल-खारिज की स्वीकृति दी गई है, लेकिन उसी तिथि पर आपत्ति की बात भी दर्ज कर दी गई। कांटी क्षेत्र के एक रैयत के आवेदन में भी वही स्थिति देखने को मिली, जहां आब्जेक्टेड केस दिखाया गया जबकि वास्तव में कोई आपत्ति नहीं थी। इससे स्पष्ट होता है कि अधिकारियों द्वारा प्रक्रिया को जानबूझकर लंबित कराने और रैयतों पर दबाव डालने की रणनीति अपनाई जा रही है।
कई रैयतों ने इस संबंध में वरीय अधिकारियों से गुहार लगाई है, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। स्थिति यह बन गई है कि एक ही तरह के मामलों में किसी की दाखिल-खारिज कर दी जाती है, तो किसी की अस्वीकृत कर दी जाती है। इससे विभाग की प्रक्रिया में भेदभाव और पक्षपात की गंभीर आशंका पैदा होती है।
राजस्व प्रक्रिया के सही पालन और रैयतों के हक़ की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि अधिकारियों द्वारा किसी भी प्रकार का मनमाना आब्जेक्टेड केस दर्ज न किया जाए। यदि कोई आवेदन वैध है तो उसे तय समयसीमा के भीतर निपटारा किया जाना चाहिए। इसी प्रकार, किसी भी प्रकार की आपत्ति या विवाद को निष्पक्ष तरीके से देखा जाना चाहिए, ताकि रैयतों को असुविधा और अनावश्यक वित्तीय दबाव से बचाया जा सके।
राजस्व विभाग में इस तरह की दखलअंदाजी और मनमानी रैयतों के विश्वास को कमजोर कर रही है। उपमुख्यमंत्री और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय सिन्हा की सख्ती के बावजूद, यदि जमीन पर कर्मचारियों और अंचल अधिकारियों का रवैया नहीं सुधरा, तो यह रैयतों के हक़ पर गंभीर असर डाल सकता है। इसलिए अधिकारियों को निर्देशित किया जाना चाहिए कि वे नियमों के अनुसार निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से दाखिल-खारिज प्रक्रिया पूरी करें, और किसी भी तरह की मनमानी वसूल या दबाव से बचें।
इस पूरे मुद्दे से स्पष्ट है कि बिहार में दाखिल-खारिज प्रक्रिया में सुधार की सख्त आवश्यकता है। विभागीय निगरानी और नियमित ऑडिट के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि रैयतों को उनके हक़ का अधिकार समय पर और निष्पक्ष रूप से मिले। इसके साथ ही, आब्जेक्टेड केस की मनमानी प्रवृत्ति पर कड़ा नियंत्रण रखना अनिवार्य है। तभी रैयतों का भरोसा राजस्व विभाग पर बना रहेगा और उनकी परेशानियों में कमी आएगी।